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चिन्मय मिशन सम्मेलन के उद्घाटन पर मोदी ने स्वामी चिन्मयानंद से 1993 की मुलाकात याद की

भारत मंडपम में प्रधानमंत्री ने कहा कि मिशन की शताब्दी यात्रा और 2047 तक विकसित भारत की यात्रा साथ-साथ चलेंगी, और समाज को विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ एकजुट करने का आह्वान किया।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
शाम को रोशनी से जगमगाता नई दिल्ली का भारत मंडपम (फ़ाइल फ़ोटो)
शाम को रोशनी से जगमगाता नई दिल्ली का भारत मंडपम (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: DesiBoy101 / Wikimedia Commons, CC BY 4.0

मुख्य बातें

  1. मोदी ने शुक्रवार को भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन का उद्घाटन किया।
  2. उन्होंने कहा कि स्वामी चिन्मयानंद के होलोग्राम ने उन्हें 1993 की वडोदरा मुलाकात में पहुंचा दिया।
  3. उन्होंने कहा कि पिछले 12 साल में भारत 650 से ज्यादा प्राचीन मूर्तियां वापस लाया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन का उद्घाटन किया और अपने भाषण का पहला हिस्सा मिशन के संस्थापक को याद करते हुए बिताया।

उनके बोलने से पहले आयोजकों ने स्वामी चिन्मयानंद के होलोग्राम के साथ एक “होलोबॉट” संवाद दिखाया। मोदी ने कहा कि इसने उन्हें 33 साल पीछे, 1993 में वडोदरा में आध्यात्मिक गुरु से हुई मुलाकात तक पहुंचा दिया। उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह बहुत भावुक अनुभव है।”

शिकागो से पहले की मुलाकात

मोदी ने बताया कि फरवरी-मार्च 1993 में वे स्वामी चिन्मयानंद को शिकागो में विश्व धर्म संसद के शताब्दी समारोह का न्योता देने गए थे, जो स्वामी विवेकानंद के वहां दिए भाषण के 100 साल पूरे होने पर हो रहा था। मोदी के मुताबिक चिन्मयानंद ने इस आयोजन के लिए पूरे अमेरिका में लोगों को जोड़ा, लेकिन 3 अगस्त को सैन डिएगो में उनका निधन हो गया, और 11 सितंबर को शिकागो के आयोजन में उनकी कमी महसूस हुई।

उन्होंने कहा कि उनकी आखिरी बातचीत युवाओं पर थी। “उसका मुख्य सार था युवा शक्ति का निर्माण, और युवा शक्ति के जरिए एक मजबूत और सक्षम भारत का निर्माण!”

उन्होंने अमृत महोत्सव के युवा स्वयंसेवकों की तारीफ की, जिन्होंने उनके मुताबिक 300 दिनों में 40,000 किलोमीटर की यात्रा कर एक लाख से ज्यादा युवाओं से संपर्क किया।

शिक्षा और विरासत

मोदी ने कहा कि 100 से ज्यादा चिन्मय शिक्षण संस्थान लाखों छात्रों को पढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा, “इन संस्थानों में उन्हें आधुनिक शिक्षा मिल रही है और वे भारतीय मूल्य भी आत्मसात कर रहे हैं।” उन्होंने इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा और मातृभाषा में पढ़ाई पर जोर से जोड़ा।

उन्होंने याद किया कि कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला स्मारक बनाने के एकनाथ रानडे के संकल्प का चिन्मयानंद ने समर्थन किया था और उसके लिए पहला दान दिया था। इसके बाद उन्होंने विरासत पर अपनी सरकार के काम गिनाए: काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में राम मंदिर, उज्जैन में महाकाल महालोक, और केदारनाथ व बद्रीनाथ में हुआ काम।

देश से बाहर ले जाई गई प्राचीन वस्तुओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “पिछले 12 वर्षों में हम ऐसी साढ़े छह सौ से अधिक प्राचीन मूर्तियां वापस लाए हैं।”

“समाज को एकजुट करना है”

भाषण के आखिर में प्रधानमंत्री ने कहा कि हर पीढ़ी को अपने समय की चुनौतियों का सामना करना होता है, जैसे चिन्मयानंद ने अपने समय में किया। उन्होंने कहा, “आज हमें समाज को विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ एकजुट करना है।” उन्होंने आत्मनिर्भरता और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य से हर नागरिक को जोड़ने की बात भी कही।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि 2047 में आजादी के सौ साल चिन्मय मिशन की शताब्दी अवधि के साथ पड़ेंगे। उन्होंने कहा, “यानी चिन्मय मिशन की शताब्दी यात्रा और विकसित भारत की यात्रा साथ-साथ आगे बढ़ेंगी।”

एक्स पर मोदी ने लिखा कि मिशन ने “दशकों तक समुदायों की सेवा की है और भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को दुनिया तक पहुंचाया है।”

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