विज्ञान-तकनीकजलवायु
विशाखापत्तनम के एआई डेटा सेंटर हवा से ठंडे होंगे, मुदसरलोवा का पानी बचाने का दावा
अदाणीकॉनेक्स का कहना है कि विशाखापत्तनम में गूगल के प्रस्तावित एआई हब के कैंपस पानी खपाने वाले कूलिंग टावरों के बिना चलेंगे। कार्यकर्ता पीने के पानी के जलाशय और वन्यजीव अभयारण्य से इनकी नज़दीकी पर सवाल उठा रहे हैं।

मुख्य बातें
- मुदसरलोवा और तरलुवाडा कैंपस में वाष्पीकरण आधारित कूलिंग की जगह एयर-कूल्ड सिस्टम होंगे।
- तीन जगहों पर कुल मीठे पानी की खपत एक ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल से कम रहेगी।
- 6.5 गीगावाट तक फैलने पर पूरे इकोसिस्टम को सालाना करीब 3 टीएमसी पानी चाहिए हो सकता है।
अदाणीकॉनेक्स विशाखापत्तनम में गूगल के प्रस्तावित आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हब के लिए जो डेटा सेंटर बना रही है, उन्हें पानी के बजाय हवा से ठंडा किया जाएगा। कंपनी की योजनाओं से यह बात सामने आई है, जिसे उन आलोचकों का जवाब माना जा रहा है जिन्हें डर है कि ये कैंपस शहर का जलाशय सुखा देंगे।
अदाणी एंटरप्राइज़ेज़ और अमेरिकी कंपनी एजकॉनेक्स का संयुक्त उपक्रम अदाणीकॉनेक्स करीब 1 गीगावाट की प्रस्तावित परियोजना के तहत मुदसरलोवा और तरलुवाडा में कैंपस बना रहा है। आंध्र प्रदेश सरकार गूगल हब को मंज़ूरी दे चुकी है।
कैंपस में “पानी आधारित वाष्पीकरण कूलिंग की ज़रूरत खत्म करने के लिए एयर-कूल्ड सिस्टम” होंगे, यानी वे कूलिंग टावर नहीं होंगे जिनकी वजह से कई डेटा सेंटर भारी मात्रा में पानी खपाते हैं। गूगल कह चुकी है कि वह वहां “उन्नत एयर-कूलिंग तकनीक इस्तेमाल करने की योजना” बना रही है।
योजनाओं की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक तीन जगहों पर मीठे पानी की कुल खपत एक ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल से कम होगी, और इसका करीब 80% हिस्सा बागवानी, रसोई और कर्मचारियों की सुविधाओं में जाएगा। कैंपस नगर निगम की सप्लाई के बजाय अलग औद्योगिक जल कनेक्शन से पानी लेंगे। घरेलू गंदे पानी को परिसर में ही साफ़ करके सिंचाई और फ़्लशिंग में दोबारा इस्तेमाल किया जाएगा, और कुछ भी मुदसरलोवा जलाशय में नहीं छोड़ा जाएगा।
यह जलाशय शहर के पीने के पानी का एक स्रोत है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसके और कंबालाकोंडा वन्यजीव अभयारण्य के इतने करीब निर्माण पर सवाल उठाए हैं। आलोचकों ने पर्यावरण आकलन और परियोजनाओं की असल पानी ज़रूरत पर भी संदेह जताया है।
सरकार का कहना है कि अगर पूरा डेटा सेंटर इकोसिस्टम 6.5 गीगावाट तक बढ़ता है, तो उसे सालाना करीब 3 टीएमसी पानी चाहिए हो सकता है। राज्य के आईटी मंत्री नारा लोकेश परियोजना की संसाधन ज़रूरतों से जुड़े दावों को गलत सूचना बताकर खारिज कर चुके हैं।