विज्ञान-तकनीकस्वास्थ्य
वज़न घटाने की दवा लेने वालों में नाख़ून और बालों की ज़्यादा शिकायतें: यूरोपीय अध्ययन
यूरोप में एक सम्मेलन में त्वचा विशेषज्ञों ने बताया कि ओज़ेम्पिक और मौंजारो जैसी जीएलपी-1 दवाएँ लेने वालों ने नाख़ून के अपनी जगह से उखड़ने की शिकायत चार गुना ज़्यादा की।

मुख्य बातें
- नाख़ून उखड़ने की शिकायत 39% जीएलपी-1 उपयोगकर्ताओं ने की, जबकि दवा न लेने वालों में यह 9% थी।
- आधे उपयोगकर्ताओं ने असामान्य रूप से बाल झड़ने की बात कही, तुलना वाले समूह में यह 34% थी।
- लेखकों का कहना है कि अध्ययन संबंध दिखाते हैं, कारण नहीं, और आगे परीक्षण होंगे।
वज़न घटाने और डायबिटीज़ के लिए लोकप्रिय जीएलपी-1 दवाएँ लेने वाले लोग नाख़ून और बालों की समस्याओं की शिकायत उन लोगों से कहीं ज़्यादा करते हैं जो ये दवाएँ नहीं लेते। यह बात यूरोपियन एकेडमी ऑफ़ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी (ईएडीवी) कांग्रेस 2026 में पेश दो अध्ययनों में सामने आई है।
शोधकर्ताओं ने ओज़ेम्पिक, वेगोवी, मौंजारो, ज़ेपबाउंड, विक्टोज़ा और ट्रूलिसिटी जैसी दवाएँ ले रहे 575 लोगों की तुलना टाइप 2 डायबिटीज़ या मोटापे से जूझ रहे ऐसे 1,329 लोगों से की जिन्होंने ये दवाएँ कभी नहीं लीं। प्रतिभागी फ़्रांस, अमेरिका, ब्राज़ील और मेक्सिको से लिए गए।
उपयोगकर्ताओं ने क्या बताया
सबसे साफ़ अंतर नाख़ून के अपनी जगह से उखड़ने में दिखा। 39% जीएलपी-1 उपयोगकर्ताओं ने इसकी शिकायत की, जबकि दवा न लेने वालों में यह 9% थी, यानी चार गुना से ज़्यादा। नाख़ून का रंग बदलने की शिकायत 46% उपयोगकर्ताओं और 17% दूसरे लोगों ने की। नाख़ून की सभी समस्याओं को मिलाकर आँकड़े 66% और 53% रहे।
वज़न घटा चुके लोगों में भी यही रुझान रहा। त्वचा की पहले से मौजूद बीमारियों और पोषण की कमी का हिसाब रखने के बाद भी उपयोगकर्ताओं में नाख़ून उखड़ना और रंग बदलना दो से तीन गुना ज़्यादा था।
लेखकों में से एक डॉ. चार्ल्स ताइब ने कहा, “अब तक जीएलपी-1 उपचार से जुड़े नाख़ूनों के बदलाव मूल रूप से सुनी-सुनाई बातें ही थे।”
बालों पर साथ में हुए अध्ययन में 50% उपयोगकर्ताओं ने असामान्य रूप से बाल झड़ने की बात कही, जबकि दवा न लेने वालों में यह 34% थी। 42% ने बाल पतले होने की शिकायत की, जबकि दूसरे समूह में 19% ने। सिर की त्वचा लाल होना करीब तीन गुना ज़्यादा था। सह-लेखक डॉ. ब्रूनो हालियुआ ने कहा, “सिर की त्वचा में सूजन अपवाद नहीं, बल्कि आम बात थी।”
सीमाएँ
ये अध्ययन एक समय पर किए गए सर्वे पर आधारित थे और प्रतिभागियों के अपने बताए लक्षणों पर टिके थे, इसलिए ये संबंध तो दिखा सकते हैं, पर यह साबित नहीं करते कि समस्याएँ दवाओं से ही हुईं। करीब आधे उपयोगकर्ताओं ने कहा कि इलाज शुरू करने से पहले भी उन्हें नाख़ूनों की दिक़्क़त थी। ताइब ने कहा, “जीएलपी-1 उपचार के दौरान जो कुछ होता है, ज़रूरी नहीं कि वह सब उपचार की वजह से ही हो।”
टीम अब ऐसे अध्ययनों की योजना बना रही है जिनमें मरीज़ों पर लंबे समय तक नज़र रखी जाए और मानक क्लिनिकल जाँच हो। इस काम को त्वचा और बालों की देखभाल के उत्पाद बनाने वाले पियरे फ़ाब्र ग्रुप की कंपनी डुक्रे लैबोरेटरीज़ से संस्थागत सहयोग मिला।