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हवा में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड से बदल रहे गेहूं के प्रोटीन, अध्ययन
जर्मन शोधकर्ताओं ने गेहूं की दस किस्मों पर खेत में प्रयोग किए। सदी के मध्य तक अनुमानित CO2 स्तर पर ज़्यादातर किस्मों में ग्लूटेन घटा, और किस्मों के बीच बड़ा फ़र्क दिखा।

मुख्य बातें
- 546 पीपीएम CO2 में उगे गेहूं में ग्लूटेन कम और एटीआई नाम के प्रोटीन ज़्यादा मिले।
- जांची गई दस में से नौ किस्मों में अनाज का प्रोटीन 1.9% से 10.3% तक घटा।
- कुछ किस्में अतिरिक्त CO2 को लेकर कहीं ज़्यादा संवेदनशील निकलीं।
जर्मन शोधकर्ताओं के एक अध्ययन के मुताबिक, अगर हवा में उतनी कार्बन डाइऑक्साइड हो जितनी सदी के मध्य तक होने का अनुमान है, तो उसमें उगे गेहूं के प्रोटीन का मेल बदल जाता है। ज़्यादातर किस्मों में ग्लूटेन कम होता है और बेकिंग की गुणवत्ता गिरती है।
म्यूनिख के तकनीकी विश्वविद्यालय से जुड़े, फ़्राइज़िंग स्थित लाइबनिज़ इंस्टीट्यूट फ़ॉर फ़ूड सिस्टम्स बायोलॉजी की अगुवाई में टीम ने सर्दियों के गेहूं की दस किस्में खेत जैसी स्थितियों में उगाईं। कुछ प्लॉट में CO2 का स्तर 546 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) रखा गया और बाकी में आज जितना। नतीजे फ़ूड केमिस्ट्री पत्रिका में छपे हैं।
संस्थान के मुताबिक वायुमंडल में CO2 1980 में करीब 340 पीपीएम से बढ़कर 2024 में करीब 425 पीपीएम हो गई, और अर्थव्यवस्थाएं किस राह चलती हैं इसके हिसाब से 2050 तक यह करीब 600 पीपीएम तक पहुंच सकती है।
ज़्यादा CO2 में एमाइलेज़/ट्रिप्सिन इनहिबिटर (एटीआई) नाम के प्रोटीन आम तौर पर बढ़े, जबकि ग्लूटेन प्रोटीन, प्यूरोइंडोलीन और सीलिएक रोग से जुड़े कुछ पेप्टाइड आम तौर पर घटे। कम ग्लूटेन का संबंध खराब बेकिंग गुणवत्ता से पाया गया। नौ किस्मों में अनाज का कुल प्रोटीन 1.9% से 10.3% तक घटा, जबकि एक किस्म, हाइवेगा, में यह 2.7% बढ़ा।
अध्ययन की प्रमुख अन्वेषक सबरीना गाइसलित्ज़ ने कहा, “लेकिन इन बदलावों की मात्रा काफ़ी हद तक गेहूं की खास किस्म पर निर्भर थी।” असोरी, कैंपेसिनो, एलजी इनिशियल और मोस्कुस हर पैमाने पर संवेदनशील निकलीं, जबकि अपोस्टेल और केडब्ल्यूएस एमरिक ने तुलनात्मक रूप से बेहतर सहनशीलता दिखाई।
शोधकर्ताओं ने कहा कि इन बदलावों का असर इस पर पड़ सकता है कि लोग गेहूं से बनी चीज़ें कितनी अच्छी तरह पचा पाते हैं, लेकिन उन्होंने पक्के नतीजे से परहेज़ किया। संस्थान के फ़ूड बायोपॉलिमर केमिस्ट्री समूह की प्रमुख कैथरीना शेर्फ़ ने कहा, “इन अंतरों के वास्तविक जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी महत्व को स्पष्ट करने के लिए और अध्ययन की ज़रूरत है।”
मूल दस्तावेज़
- Climate change affects the quality of one of the world's most important staple foodsLeibniz-Institut für Lebensmittel-Systembiologie an der TU München (EurekAlert!), 16 अक्टूबर 2026