राज्यजम्मू-कश्मीर
जम्मू-कश्मीर ने सर्कुलर इकॉनमी नीति अधिसूचित की, शहरी कचरे का 90% दोबारा इस्तेमाल का लक्ष्य
नीति में दस साल के लिए ₹3,548.7 करोड़ की योजना है, सेब के बागानों के जैविक कचरे से लेकर पर्यटन के कचरे तक, और सब्सिडी की बजाय उत्पादकों और यूज़र चार्ज पर ज़ोर है।
मुख्य बातें
- योजना के लिए दस साल में ₹3,548.7 करोड़ का सांकेतिक दायरा तय है।
- शहरी इलाकों में 90% से ज़्यादा सामग्री की रिकवरी का लक्ष्य है।
- उमर अब्दुल्ला ने इसे संसाधन रिकवरी की दिशा में "निर्णायक कदम" बताया।
जम्मू-कश्मीर ने एक सर्कुलर इकॉनमी नीति अधिसूचित की है, जिसका लक्ष्य शहरों के कचरे में से 90% से ज़्यादा सामग्री को स्रोत पर बेहतर छंटाई और लैंडफिल में कम कचरा भेजकर दोबारा इस्तेमाल लायक बनाना है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इसे “संसाधन रिकवरी, हरित विकास और पारिस्थितिक स्थिरता की दिशा में एक निर्णायक कदम” बताया।
जम्मू-कश्मीर सर्कुलर इकॉनमी नीति, 2026 में दस साल के लिए ₹3,548.7 करोड़ का सांकेतिक दायरा रखा गया है। इसका खर्च केंद्रीय योजनाओं, विस्तारित उत्पादक ज़िम्मेदारी (ईपीआर) व्यवस्था, यूज़र चार्ज और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से जुटाया जाएगा, ताकि सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता कम हो।
तीन स्तर, कई तरह का कचरा
नीति स्थानीय निकायों को उनकी क्षमता के हिसाब से तीन स्तरों में बांटती है: सर्कुलर, सर्कुलर+ और सर्कुलर++। छोटे और दूरदराज़ इलाकों में कचरे का निपटारा वहीं होगा, मुख्य गलियारों के कस्बे हब-एंड-स्पोक नेटवर्क से जुड़ेंगे, और जम्मू व श्रीनगर जैसे बड़े शहरों में आधुनिक व्यवस्था होगी।
इसमें नगरपालिका का ठोस कचरा, खाने और गीला कचरा, पर्यटन का कचरा, बागवानी और खेती का जैविक कचरा, पैकेजिंग, निर्माण का मलबा, ई-कचरा और गंदा पानी शामिल है। मरम्मत, नवीनीकरण और दोबारा इस्तेमाल भी इसके दायरे में हैं, जिनमें ऊन और हस्तशिल्प से जुड़ी व्यवस्थाएं भी हैं। शहरी रिकवरी, सेब और बागवानी के जैविक कचरे, पर्यटन सर्किट और कारीगरों की सामग्री के इर्द-गिर्द क्षेत्रीय क्लस्टर बनाने की योजना है।
नीति का एक मकसद स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और कचरा कर्मियों के लिए काम के मौके पैदा करना भी है।