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शिक्षा मंत्रालय में आग के बाद अल्बानिया में छात्रों की पुलिस से झड़प
विश्वविद्यालयों की हालत और फीस को लेकर तिराना में प्रदर्शन तीसरे दिन में पहुंचे। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

मुख्य बातें
- पुलिस के मुताबिक प्रदर्शनकारी रात में अल्बानिया के शिक्षा मंत्रालय में घुसे और अंदर आग लगा दी।
- बुधवार को छात्रों के पत्थर फेंकने पर दंगा पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया।
- यह असंतोष चार महीने से चल रही रैलियों से निकला है, जिन्हें "फ्लेमिंगो क्रांति" कहा जाता है।
अल्बानिया की राजधानी तिराना में बुधवार को दंगा पुलिस ने शिक्षा मंत्रालय के बाहर जमा छात्रों पर आंसू गैस और पानी की बौछार की। विश्वविद्यालयों की हालत को लेकर प्रदर्शन तीसरे दिन में पहुंच गए। इससे कुछ घंटे पहले प्रदर्शनकारी इमारत में घुस गए थे और अंदर आग लगा दी थी।
सैकड़ों छात्र मंत्रालय के बाहर जुटे और इमारत पर पत्थर फेंके। कुछ ने पास की बाड़ उखाड़ दी और उससे सड़क रोक दी। पुलिस ने बताया कि मंगलवार रात हुई हिंसा के सिलसिले में 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जब प्रदर्शनकारी ज़बरदस्ती अंदर घुसे थे। बुधवार की झड़पों के बाद कम से कम 16 और लोगों के हिरासत में लिए जाने की खबर है।
छात्र विश्वविद्यालयों में बेहतर सुविधाएं और प्रधानमंत्री एदी रामा का इस्तीफा चाहते हैं। कई छात्रों ने स्थानीय मीडिया से कहा कि वे ट्यूशन फीस और युवाओं को मदद न मिलने से भी नाराज़ हैं।
उप प्रधानमंत्री अल्बाना कोचियू ने हिंसा की निंदा की। उन्होंने फेसबुक पर लिखा, “विरोध करना एक वैध अधिकार है, लेकिन इसे हिंसा का बहाना नहीं बनाया जा सकता।” उन्होंने छात्रों और “हर ईमानदार नागरिक” से तोड़फोड़ से दूर रहने की अपील की।
ये प्रदर्शन तिराना की मुख्य सड़कों पर चार महीने से रोज़ हो रही रैलियों के बाद आए हैं। इस आंदोलन को “फ्लेमिंगो क्रांति” कहा जाने लगा है। इसकी शुरुआत दक्षिणी अल्बानिया के एक संरक्षित इलाके में बन रहे रिज़ॉर्ट प्रोजेक्ट के विरोध से हुई थी, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर से जुड़ा है। इससे कथित भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी को लेकर गुस्सा भड़का।
बाल्कन इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग नेटवर्क के अल्बानिया संपादक बेसार लिकमेता ने कहा कि आंदोलन अब बेहतर अवसरों और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की व्यापक मांगों तक फैल गया है। इसके पीछे युवाओं के लिए अवसरों की कमी और उनमें बढ़ती यह भावना है कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया है।