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बुर्किना फ़ासो में आतंकवाद और देशद्रोह के लिए फिर से मौत की सज़ा

सैन्य सरकार की नियुक्त संसद ने सर्वसम्मति से नई दंड संहिता पास की। देश ने आठ साल पहले सामान्य अपराधों के लिए मृत्युदंड खत्म कर दिया था।

संपादकीय डेस्क से · उआगादुगूप्रकाशित
बुर्किना फ़ासो की राजधानी उआगादुगू का एक दृश्य (फ़ाइल फ़ोटो)
बुर्किना फ़ासो की राजधानी उआगादुगू का एक दृश्य (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Lamine Traoré / VOA - Voice of America / Wikimedia Commons, Public domain

मुख्य बातें

  1. बुर्किना फ़ासो की गैर-निर्वाचित संसद ने सर्वसम्मति से मृत्युदंड बहाल करने वाली दंड संहिता पास की।
  2. इसमें देशद्रोह, आतंकवाद, जासूसी, पितृहत्या और एक्सपायर्ड या प्रतिबंधित सामान के आयात को शामिल किया गया है।
  3. देश ने 2018 में सामान्य अपराधों के लिए मृत्युदंड खत्म किया था; आखिरी ज्ञात फांसी 1988 में हुई थी।

बुर्किना फ़ासो ने सामान्य अपराधों के लिए मृत्युदंड खत्म करने के आठ साल बाद उसे फिर बहाल कर दिया है। देश के सैन्य शासक हथियारबंद गुटों से लड़ाई के नाम पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर रहे हैं।

सैन्य सरकार की नियुक्त संसद ने सर्वसम्मति से नई दंड संहिता पास की, जिसके तहत देशद्रोह, आतंकवाद, जासूसी, पितृहत्या और एक्सपायर्ड या प्रतिबंधित सामान के आयात पर मौत की सज़ा दी जा सकेगी। बुर्किना फ़ासो ने 2018 में सामान्य अपराधों के लिए मृत्युदंड हटाया था और वहां आखिरी ज्ञात न्यायिक फांसी 1988 में हुई थी।

न्याय मंत्री एदासो रोड्रिग बायाला ने इस बदलाव को आतंकवाद से निपटने के लिए ज़रूरी बताया। उनका तर्क था कि हथियारबंद गुट पुराने कानून की नरमी का फायदा उठाते थे और भर्ती होने वालों से कहते थे कि उन्हें उम्रकैद से ज़्यादा सज़ा नहीं होगी।

हर हाल में मृत्युदंड का विरोध करने वाले संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि यह कदम आलोचकों पर व्यापक कार्रवाई के बीच उठाया गया है। सितंबर 2022 के तख्तापलट में सत्ता हथियाने के बाद से सैन्य सरकार ने मीडिया संस्थानों पर पाबंदी लगाई है, यूनियनों और नागरिक संगठनों को निलंबित किया है और बहुदलीय राजनीति खत्म कर दी है। संगठन ने अधिकारियों पर मनमानी हिरासत, जबरन गायब करने, आलोचकों की जबरन सैन्य भर्ती और यातना के आरोप लगाए हैं।

संगठन ने उन अदालतों की कमज़ोरियों की ओर भी ध्यान दिलाया जहां ऐसे मामलों की सुनवाई होगी। आतंकवाद के सभी मामले 2017 में बनी एक विशेष न्यायिक इकाई में जाते हैं, जहां इस साल की शुरुआत में संगठन ने धीमी जांच और गंभीर प्रक्रियागत खामियां दर्ज की थीं। उस अदालत के एक पूर्व जज ने संगठन को बताया कि जज कभी-कभी कमज़ोर सबूतों के बावजूद संदिग्धों को हिरासत में रखते थे, इस डर से कि रिहा होने पर उन्हें बिना सुनवाई मार दिया जाएगा। उन्होंने कहा, “जीवन के अधिकार को बचाने के लिए स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करना बेहतर है।”

यह फैसला इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय दबाव के उलट है। संयुक्त राष्ट्र महासभा और अफ्रीकी मानवाधिकार आयोग, दोनों ने देशों से मृत्युदंड पर रोक लगाने और उसे खत्म करने की दिशा में बढ़ने की अपील की है।