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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की 15 सीटें बिना मुकाबले भरीं

लगातार दूसरे साल हर क्षेत्रीय समूह ने उतने ही उम्मीदवार उतारे, जितनी उसकी सीटें थीं। ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि ऐसा मतदान 'चुनाव' शब्द का मज़ाक है।

संपादकीय डेस्क से · न्यूयॉर्कप्रकाशित
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का सभागार
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का सभागारPhoto: U.S. Department of State from United States / Wikimedia Commons, Public domain

मुख्य बातें

  1. 193 सदस्यों वाली महासभा ने मंगलवार को 47 देशों की मानवाधिकार परिषद के लिए 15 देशों को चुना।
  2. एशिया-प्रशांत की चार सीटें नेपाल, जापान, जॉर्डन और कुवैत को मिलीं, पूर्वी यूरोप की दो यूक्रेन और मोल्दोवा को।
  3. ह्यूमन राइट्स वॉच ने इसे "बिना मुकाबले का मतदान" बताया और असली चुनावी मुकाबले की मांग की।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मंगलवार को 15 देशों को तीन साल के कार्यकाल के लिए मानवाधिकार परिषद का सदस्य चुना। इस चुनाव में किसी भी सीट पर मुकाबला नहीं था। लगातार दूसरे साल हर क्षेत्रीय समूह ने ठीक उतने ही उम्मीदवार उतारे, जितनी सीटें उसे भरनी थीं।

नए सदस्य हैं: अफ्रीका से ज़ाम्बिया, घाना, नाइजीरिया और बुरुंडी; एशिया-प्रशांत से कुवैत, नेपाल, जॉर्डन और जापान; लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्र से ब्राज़ील, डोमिनिकन गणराज्य और उरुग्वे; पश्चिमी समूह से आयरलैंड और जर्मनी; और मध्य व पूर्वी यूरोप से मोल्दोवा और यूक्रेन। यूक्रेन और उसके पड़ोसी मोल्दोवा ने उस क्षेत्र की दोनों सीटें आपस में बांट लीं।

नए सदस्य 47 देशों की इस परिषद में शामिल होंगे, जो संयुक्त राष्ट्र की सबसे ऊंची मानवाधिकार संस्था है। क्योंकि किसी सीट पर मुकाबला नहीं था, इसलिए 193 सदस्य देशों के वोट डालने से पहले ही सभी 15 उम्मीदवारों की सीट पक्की थी।

“थाली में परोसकर”

ह्यूमन राइट्स वॉच के संयुक्त राष्ट्र निदेशक लुई शारबोनो ने कहा, “बिना मुकाबले का यह मतदान ‘चुनाव’ शब्द का मज़ाक बनाता है।” उन्होंने कहा, “इस अहम संस्था की सीट किसी को चांदी की थाली में परोसकर नहीं मिलनी चाहिए।”

उन्होंने सदस्य देशों से अपील की कि वे “मुकाबले वाली सूचियों पर ज़ोर दें, ताकि खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को खारिज किया जा सके”।

शारबोनो की यह अपील उन सरकारों के लिए थी जो क्षेत्रीय सूचियां तय करती हैं। हर सीट पर एक ही उम्मीदवार होने से महासभा के पास किसी को भी नामंज़ूर करने का रास्ता नहीं था।