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दुनिया 1.5 डिग्री की सीमा पार करेगी, लौटने के लिए 2030 तक 18% उत्सर्जन घटाना होगा: संयुक्त राष्ट्र
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की सालाना उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा नीतियों से तापमान 2.8 डिग्री बढ़ेगा। एंतोनियो गुतेरेस ने कहा कि सीमा पार होना 'हार मान लेना नहीं' है।
मुख्य बातें
- यूएनईपी का कहना है कि दुनिया अब 1.5 डिग्री की सीमा पार होने से नहीं बच सकती।
- तापमान वापस लाने के लिए 2025 के मुकाबले 2030 तक 18% और 2035 तक 45% उत्सर्जन घटाना होगा।
- मौजूदा नीतियों से इस सदी में 2.8 डिग्री तापमान वृद्धि होगी।
संयुक्त राष्ट्र ने बुधवार को कहा कि दुनिया अब पेरिस समझौते में तय 1.5 डिग्री सेल्सियस की तापमान सीमा पार होने से नहीं बच सकती। सदी के अंत तक तापमान वापस नीचे लाना है तो देशों को अपने वादों से कहीं तेज़ी से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाना होगा।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की सालाना उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट कहती है कि अब भी बचे सबसे अच्छे रास्ते में तापमान सदी के मध्य के आसपास 1.7 से 1.8 डिग्री पर चरम पर पहुंचेगा और फिर 2100 तक 1.5 डिग्री या उससे नीचे लौटेगा, जिसकी संभावना करीब 50% है। इसके लिए वैश्विक उत्सर्जन को 2025 के स्तर से 2030 तक 18%, 2035 तक 45% और 2040 तक 69% घटाना होगा।
देशों की जलवायु योजनाएं इससे बहुत पीछे हैं। पूरी तरह लागू होने पर भी वे 2030 तक उत्सर्जन सिर्फ़ 5% से 8% और 2035 तक 11% से 15% घटाएंगी। मौजूदा नीतियों पर दुनिया इस सदी में 2.8 डिग्री तापमान वृद्धि की ओर बढ़ रही है; हर देश अपना वादा पूरा करे तो 2.6 डिग्री।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतेरेस ने रिपोर्ट के साथ जारी संदेश में कहा, “सीमा पार होना हार मान लेना नहीं है।” उन्होंने सरकारों से इसे “जितना हो सके छोटा और कम समय का” रखने की अपील की।
यूएनईपी की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा कि डिग्री का हर अतिरिक्त अंश खतरा बढ़ाता है। उन्होंने कहा, “हमें चरम तापमान को कम से कम रखने और सदी के अंत तक 1.5 डिग्री पर लौटने के लिए पूरी ताकत लगानी होगी।”
क्या करना होगा
रिपोर्ट के मुताबिक 2035 तक दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति में कोयले, तेल और गैस की हिस्सेदारी क्रमशः कम से कम 55%, 15% और 5% घटानी होगी और मीथेन उत्सर्जन कम से कम 25% नीचे लाना होगा। 1.5 डिग्री से नीचे लौटने के लिए इस सदी में करीब 320 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण से निकालकर स्थायी रूप से जमा करना होगा, जो मौजूदा दर से लगभग आठ साल के उत्सर्जन के बराबर है। लेखकों के मुताबिक यह तरीका अनिश्चित है।
कुछ अच्छी खबर भी है: 2015 के बाद से दुनिया की अक्षय ऊर्जा क्षमता उस समय के अनुमान से करीब तीन गुना तेज़ी से बढ़ी है, और सौर ऊर्जा करीब सात गुना तेज़ी से।
यूएनईपी ने कहा कि पेरिस समझौते से अमेरिका के हटने से तस्वीर और बिगड़ी है। शोध संस्था क्लाइमेट एनालिटिक्स के प्रमुख बिल हेयर ने कहा कि अमेरिका और सऊदी अरब जैसे बड़े प्रदूषकों को “राजनीति बंद करके वैज्ञानिक सच्चाई का सामना करना चाहिए”।
मूल दस्तावेज़
- New UNEP report lays out emission cuts needed for return to 1.5°CUN Environment Programme, 21 अक्टूबर 2026
- Global warming will breach 1.5°CUN News, 21 अक्टूबर 2026