नीतिखाद्य सुरक्षा
लैक्टोजेन प्रो 1 'आसानी से पचता है', साबित करे नेस्ले इंडिया: शिशु आहार पर एफएसएसएआई की सख्ती बढ़ी
खाद्य नियामक ने बुधवार को शिशु आहार बनाने वाली कंपनियों और एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को नए नोटिस भेजे और पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता व दिमागी विकास से जुड़े दावों पर सवाल उठाए।
मुख्य बातें
- एफएसएसएआई ने नेस्ले इंडिया से लैक्टोजेन प्रो 1 के व्हे प्रोटीन के आसानी से पचने का वैज्ञानिक प्रमाण मांगा है।
- एक इन्फ्लुएंसर को इंस्टाग्राम पर शिशु फ़ॉर्मूला के प्रचार पर नोटिस मिला, जिस पर कानूनन रोक है।
- एफएसएसएआई के मुख्य कार्यकारी राजित पुन्हानी कह चुके हैं कि हाल के महीनों में 150 से ज़्यादा खाद्य और पेय कंपनियों को नोटिस गए हैं।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने नेस्ले इंडिया से कहा है कि वह अपने शिशु फ़ॉर्मूला लैक्टोजेन प्रो 1 के व्हे प्रोटीन के “आसानी से पचने” के दावे को साबित करे। यह नोटिस उन नए नोटिसों में से एक है जो नियामक ने बुधवार को शिशु आहार बनाने वाली कंपनियों और एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को भेजे।
नोटिस में कंपनी से तय समय के भीतर वैज्ञानिक प्रमाण जमा करने और यह बताने को कहा गया है कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। नियामक ने कहा कि लेबल, पैकेट या विज्ञापन पर किए गए हर दावे के पीछे पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण होना चाहिए।
बुधवार रात तक नेस्ले इंडिया ने नोटिस पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी।
इम्यूनिटी, दिमाग और इंस्टाग्राम
लैक्टोजेन का नोटिस अकेला नहीं था। एक अन्य नोटिस में एफएसएसएआई ने इस दावे पर आपत्ति जताई कि किसी उत्पाद के कुछ तत्व सामान्य रोग प्रतिरोधक तंत्र को सहारा देते हैं। नियामक के मुताबिक इससे यह संकेत मिल सकता है कि वह आहार किसी खास शारीरिक स्थिति के लिए उपयुक्त है। नोटिस में कहा गया कि यह दावा बीमारी की “रोकथाम, राहत या इलाज से जुड़े दावों पर रोक लगाने वाले प्रावधानों के अनुरूप नहीं” माना गया।
एक इन्फ्लुएंसर को भी इंस्टाग्राम पोस्ट को लेकर नोटिस भेजा गया, जिनमें सुझाए गए शिशु फ़ॉर्मूला उत्पादों को संतुलित पोषण, बेहतर इम्यूनिटी, दिमागी विकास और आसान पाचन का श्रेय दिया गया था। नियामक ने कहा, “शिशु दुग्ध विकल्पों के प्रचार को 2003 में संशोधित शिशु दुग्ध विकल्प अधिनियम, 1992 का उल्लंघन बताया गया।” यह कानून शिशु दुग्ध विकल्पों के विज्ञापन और प्रचार पर रोक लगाता है। नोटिसों में खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण आहार) विनियम, 2020 के विज्ञापन और प्रचार संबंधी नियमों का भी हवाला दिया गया है।
एफएसएसएआई के मुख्य कार्यकारी राजित पुन्हानी कह चुके हैं कि हाल के महीनों में 150 से ज़्यादा खाद्य और पेय कंपनियों को नोटिस भेजे गए हैं। कॉम्प्लान और नेस्ले के नैन एक्सेला प्रो स्टेज 1 जैसे उत्पादों पर भी इसी तरह की कार्रवाई हुई है।
एक ही दावे पर दूसरी बार
लैक्टोजेन का यह दावा नियामक के लिए नया नहीं है। 18 सितंबर को एफएसएसएआई ने नेस्ले इंडिया के खिलाफ तीन न्यायिक निर्णय (एडजुडिकेशन) मामले शुरू किए थे। इनमें से दो नैन एक्सेला प्रो स्टेज 1 के दावों और लैक्टोजेन प्रो 1 के “आसानी से पचने वाले” व्हे प्रोटीन के दावे से जुड़े थे। नियामक ने कहा था कि ये 2020 के शिशु पोषण नियमों के विनियम 4(2) और शिशु दुग्ध विकल्प अधिनियम की धारा 3 का उल्लंघन हैं। तीसरा मामला एक फ़ॉलो-अप फ़ॉर्मूला का था, जिसमें रेफ़रल प्रयोगशाला ने बायोटिन की मात्रा कम पाई थी।
तब नेस्ले इंडिया ने कहा था कि “ये उत्पाद (यानी नैन एक्सेला प्रो और लैक्टोजेन प्रो) और उनके लेबल एफएसएसएआई की विशेषज्ञ समिति से मंज़ूर थे” और उसके लेबल पर लिखी बातें “तथ्यात्मक हैं और वैज्ञानिक साहित्य से समर्थित हैं।”
ये नोटिस ऐसे समय आए हैं जब कुछ ही दिन पहले एफएसएसएआई ने छह महीने से कम उम्र के शिशुओं के आहार में अलग से सुक्रोज़ और फ़्रुक्टोज़ मिलाने पर रोक का प्रस्ताव रखा था।