नीतिविदेश मामले
मानवाधिकार राजनीतिक दबाव का हथियार न बनें: संयुक्त राष्ट्र में भारत
जबरन गुमशुदगी पर महासभा की बहस में विदेश मंत्रालय की एक अधिकारी ने भारत के कानूनी सुरक्षा उपाय गिनाए और बिना पुष्टि के आरोपों के खिलाफ आगाह किया।

मुख्य बातें
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में कहा कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल चुनिंदा देशों को निशाना बनाने में न हो।
- विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने अनुच्छेद 21, बंदी प्रत्यक्षीकरण और मानवाधिकार आयोगों का हवाला दिया।
- भारत ने कहा कि वह ठीक से दर्ज मामलों पर स्थापित माध्यमों से स्पष्टीकरण देने को तैयार है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र से कहा है कि मानवाधिकारों को “राजनीतिक दबाव या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने का हथियार” नहीं बनाया जाना चाहिए। न्यूयॉर्क में महासभा में जबरन और अनैच्छिक गुमशुदगी पर हुई बहस में यह बात कही गई।
विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने तीसरी समिति में यह बयान दिया। यह समिति सामाजिक, मानवीय और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे देखती है और इस बार जबरन या अनैच्छिक गुमशुदगी पर संयुक्त राष्ट्र के कार्य समूह के कामकाज पर चर्चा कर रही थी।
उन्होंने भारत के सुरक्षा उपाय गिनाए। उन्होंने कहा, “हमारे संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।” उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोगों और सूचना के अधिकार कानून को भी ऐसे माध्यम बताया जिनसे नागरिक सरकार की जवाबदेही तय कर सकते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने जबरन गुमशुदगी से सभी व्यक्तियों की सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किए हैं।
ताम्रकार ने संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्थाओं से सटीक रिपोर्टिंग की अपील की और बिना पुष्टि वाले आरोपों और अधूरे आंकड़ों पर भरोसा करने के खिलाफ आगाह किया। उन्होंने कहा, “भारत ठीक से दर्ज किए गए विशिष्ट मामलों पर स्थापित माध्यमों से स्पष्टीकरण देने को तैयार है।”