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डल झील में मोटर वाले शिकारों और जेट स्की पर हाईकोर्ट की रोक

अंतरिम आदेश के तहत श्रीनगर की मशहूर झील से अगले आदेश तक ईंधन से चलने वाली सभी नावें हटेंगी। प्रशासन से सौर और इलेक्ट्रिक इंजन का विकल्प तलाशने को कहा गया है।

संपादकीय डेस्क से · श्रीनगरप्रकाशित
श्रीनगर की डल झील में शिकारे
श्रीनगर की डल झील में शिकारेPhoto: Fulvio Spada from Torino, Italy / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0

मुख्य बातें

  1. डल झील में मोटर वाले शिकारों और जेट स्की समेत ईंधन से चलने वाली सभी नावों पर रोक लगी है।
  2. झील में चलती पाई गई कोई भी नाव अदालत की अवमानना मानी जाएगी।
  3. प्रशासन को मोटरबोट नीति बनानी होगी; अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने डल झील में ईंधन से चलने वाली सभी मोटरबोट पर रोक लगा दी है, जिनमें मोटर वाले शिकारे और जेट स्की भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि ये नावें झील के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रही हैं और प्रदूषण बढ़ा रही हैं।

मुख्य न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस राजेश सेखरी की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर को यह अंतरिम आदेश दिया, जो अगले आदेश तक लागू रहेगा। झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एलसीएमए), पर्यटन विभाग और पुलिस को इसे तुरंत लागू करने को कहा गया है। झील में चलती पाई गई कोई भी मोटरबोट अदालत के आदेश की अवमानना मानी जाएगी और संबंधित अधिकारियों से सख्त कार्रवाई की अपेक्षा है।

आपात सेवाओं, आपदा प्रबंधन, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था में लगी सरकारी नावों को छूट दी गई है।

मामला लाइसेंस के विवाद से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता मोहम्मद रफीक मीर और अन्य ने मोटरबोट के लाइसेंस और नवीनीकरण के नियमों को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि लाइसेंस देने का काम पर्यटन अधिकारियों से सड़क परिवहन कार्यालय को सौंपे जाने के बाद संचालक असमंजस में हैं। उन्होंने एक समान, पारदर्शी और पर्यावरण का ध्यान रखने वाले मानदंड मांगे थे।

पीठ इससे आगे गई। उसने प्रशासन को विशेषज्ञों से सलाह लेकर मोटर वाली नावों पर एक व्यापक नीति बनाने का निर्देश दिया, जिसमें पर्यटन और प्रदूषण नियंत्रण के बीच संतुलन हो। प्रशासन की ओर से पेश वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता मोहसिन एस. कादरी से यह जांचने को कहा गया कि क्या ईंधन इंजनों की जगह सौर या इलेक्ट्रिक इंजन लगाए जा सकते हैं, और इस पर अदालत को रिपोर्ट दें। अदालत ने कहा कि पर्यटन और झील दोनों को बचाए रखने के लिए ऐसी नावें “एक समाधान हो सकती हैं”।

मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी।