नीतिलद्दाख
अनुच्छेद 371-के का मसौदा ठुकराए जाने को लद्दाख के मुख्य सचिव ने 'बेहद दुर्भाग्यपूर्ण' बताया
आशीष कुंद्रा ने कहा कि लेह और करगिल के नेताओं ने गृह मंत्रालय का 32 पन्नों का प्रस्ताव दो घंटे में खारिज कर दिया। दोनों पक्ष 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में फिर मिलेंगे।

मुख्य बातें
- गृह मंत्रालय के मसौदे में लद्दाख के लिए नया अनुच्छेद 371-के और अनुच्छेद 240 के तहत विनियमन का प्रस्ताव है।
- लेह एपेक्स बॉडी और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने इसे शुक्रवार को खारिज कर दिया, कहा कि इसमें असली अधिकारों वाली विधायिका नहीं है।
- बातचीत 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में फिर शुरू होगी।
लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने शनिवार को केंद्र के ताजा प्रस्ताव के ठुकराए जाने को “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” बताया। उन्होंने कहा कि लेह और करगिल के नेताओं ने गृह मंत्रालय का 32 पन्नों का खाका मिलने के दो घंटे के भीतर ही खारिज कर दिया।
लेह में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुंद्रा ने कहा, “यह देखकर हैरानी हुई कि दस्तावेज मिलने के महज दो घंटे के भीतर उसे सिरे से खारिज कर दिया गया।” उन्होंने कहा, “भारत सरकार जल्द से जल्द राजनीतिक समाधान निकालने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”
लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) ने शुक्रवार को यह मसौदा ठुकरा दिया था। दोनों पक्ष 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में फिर मिलेंगे।
केंद्र ने क्या पेशकश की
गृह मंत्रालय ने यह खाका 16 अक्टूबर को सौंपा, यानी लेह में लद्दाख के प्रतिनिधियों से उसके अधिकारियों की बातचीत के एक दिन बाद। इसमें दो चरण हैं: पहले एक संविधान संशोधन, जिसके जरिए लद्दाख के लिए नया अनुच्छेद 371-के जोड़ा जाएगा, और फिर संविधान के अनुच्छेद 240 के तहत एक विनियमन। इसमें पूरे केंद्र शासित प्रदेश के लिए सीधे चुनी जाने वाली एक संस्था का प्रस्ताव है, साथ ही जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और संस्कृति से जुड़े संरक्षण भी।
कुंद्रा ने कहा कि यह दस्तावेज बातचीत का आधार है, कोई तैयार कानून नहीं। कई सवाल खुले छोड़े गए हैं: संस्था का नाम क्या होगा और उसमें कौन होगा, सदस्य कैसे और किस प्राधिकरण के जरिए चुने जाएंगे, महिलाओं और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों की सीटें, मनोनीत और पदेन सदस्य, परिसीमन, मतदाता सूची और कार्यकाल, और नई संस्था हिल काउंसिलों, पंचायतों और नगर निकायों के साथ कैसे काम करेगी।
उन्होंने कहा, “हर ब्योरा संविधान संशोधन में शामिल नहीं किया जा सकता।” उनके मुताबिक ये मुद्दे “एकतरफा तरीके से तय नहीं हो सकते” और इनके लिए लद्दाख के नेतृत्व में व्यापक सहमति जरूरी है। उन्होंने कहा, “बातचीत के लिए खुला दिमाग, आपसी भरोसा और सबसे बढ़कर धैर्य चाहिए।”
उन्होंने कहा कि केंद्र बदलावों पर विचार करने को तैयार है और उम्मीद जताई कि बाकी मुद्दे “आने वाले हफ्तों और महीनों में” सुलझ जाएंगे। उन्होंने पहले से उठाए गए कदम भी गिनाए, जिनमें स्थानीय निवासियों के लिए बढ़ा आरक्षण, क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता और हिल काउंसिलों में महिलाओं के लिए सीटें शामिल हैं। उन्होंने कहा, “किसी के लिए उम्मीद छोड़ने की कोई वजह नहीं है।”
लेह और करगिल ने इनकार क्यों किया
दोनों संगठनों का कहना है कि मसौदा उनकी संवैधानिक संरक्षण की मांग और कार्यकारी, विधायी और वित्तीय अधिकारों वाली विधायिका की मांग को पूरा नहीं करता।
एलएबी के अध्यक्ष छेरिंग दोरजे लकरुक ने पुष्टि की कि दोनों संगठनों ने प्रस्ताव ठुकरा दिया है। केडीए के सह-अध्यक्ष असगर अली करबलाई ने कहा कि गृह मंत्रालय मई में बनी सहमति से “पीछे हट गया” है। तब दोनों पक्ष सैद्धांतिक रूप से इस बात पर राजी हुए थे कि लद्दाख को नगालैंड, सिक्किम और मिजोरम से जुड़े अनुच्छेद 371ए, 371एफ और 371जी की तर्ज पर संरक्षण दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित संस्था मौजूदा काउंसिल से भी नीचे होगी और इस बदलाव को “अच्छा संकेत नहीं” बताया।
करबलाई ने उपराज्यपाल और मुख्य सचिव पर विकास परियोजनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रधानमंत्री के सामने पेश करने का आरोप भी लगाया। दोनों संगठनों ने 9 सितंबर को नई दिल्ली में हुई पिछली बातचीत को “बेनतीजा” बताया था।
हिल काउंसिलों के नए नियम
इस बीच केंद्र ने लद्दाख की दोनों स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों से जुड़े विनियमन में संशोधन किया है। अब प्रशासन हर परिषद में चुनी जाने वाली सीटों की संख्या 7 से 24 के बीच तय कर सकेगा, महिलाओं और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों से चार तक सदस्य मनोनीत कर सकेगा, और चुनाव कराना व्यावहारिक न होने पर परिषद का पांच साल का कार्यकाल बढ़ा सकेगा।
22 अक्टूबर की दिल्ली बैठक से पता चलेगा कि मसौदे में बदलाव की गुंजाइश बनती है या बातचीत फिर अटक जाती है।