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टीवीके के प्रचार रील में बच्चे 'घटिया' हरकत, पर अनुचित प्रभाव नहीं: मद्रास हाईकोर्ट
जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने सेलम नॉर्थ में टीवीके की जीत के खिलाफ डीएमके उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी और कहा कि वयस्क मतदाताओं ने फिर भी अपनी पसंद से वोट दिया।

मुख्य बातें
- मद्रास हाईकोर्ट ने सेलम नॉर्थ के टीवीके विधायक आर राजेंद्रन के खिलाफ डीएमके की चुनाव याचिका खारिज कर दी।
- जज ने प्रचार रील में बच्चों के इस्तेमाल को 'घटिया और राजनीति से प्रेरित' बताया, पर भ्रष्ट आचरण नहीं माना।
- राजेंद्रन ने 2026 में यह सीट करीब 14,000 वोटों से जीती थी।
बच्चों से उनके माता-पिता पर किसी पार्टी को वोट देने का दबाव डलवाना और उसका सोशल मीडिया वीडियो बनाना भले ही बुरी बात हो, लेकिन इससे चुनाव रद्द नहीं होता। मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सेलम नॉर्थ में टीवीके की जीत को डीएमके उम्मीदवार की चुनौती खारिज कर दी है।
रविवार को सार्वजनिक हुए फैसले में जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने के शिवकुमार की चुनाव याचिका खारिज कर दी, जो 2026 के विधानसभा चुनाव में यह सीट टीवीके के आर राजेंद्रन से हार गए थे। राजेंद्रन को 85,710 और शिवकुमार को 71,676 वोट मिले थे।
बच्चों वाला प्रचार
शिवकुमार की याचिका में कहा गया था कि बच्चों को टीवीके की रैलियों और प्रचार में शामिल किया गया, पार्टी अध्यक्ष विजय ने उनसे माता-पिता और रिश्तेदारों पर पार्टी के ‘सीटी’ चुनाव चिह्न को वोट देने का दबाव डालने को कहा, और सोशल मीडिया रील में बच्चे यही करते दिखे। उनका तर्क था कि यह प्रचार में बच्चों के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाले चुनाव आयोग के परिपत्र का उल्लंघन है और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(2) के तहत अनुचित प्रभाव यानी भ्रष्ट आचरण है।
जज ने अपनी नाराजगी नहीं छिपाई। उन्होंने कहा, “मासूम बच्चों को इसमें शामिल करना ही बुरी बात है,” और जोड़ा कि “इसकी रील बनाना घटिया और राजनीति से प्रेरित है”। उन्होंने कहा कि बच्चों से वयस्कों के भावनात्मक रिश्ते का “पसंद बदलने के लिए फायदा उठाया गया”।
याचिका क्यों खारिज हुई
लेकिन कानून की कसौटी ऊंची है। अदालत ने कहा कि अनुचित प्रभाव का मतलब है “मन पर ऐसा दबाव जो बिना कायल किए इच्छा पर हावी हो जाए”, और जो वयस्क किसी बच्चे के कहने पर वोट देता है, वह फिर भी अपना फैसला खुद करता है।
जज ने कहा कि चुनाव आयोग का परिपत्र वैधानिक प्रकृति का होने के बावजूद अधिनियम के तहत “आदेश” नहीं है, इसलिए उसका उल्लंघन चुनाव रद्द करने का आधार नहीं है। पार्टी अध्यक्ष के तौर पर विजय की अपील को उम्मीदवार का अपना काम या उसकी सहमति से किया गया काम भी नहीं माना जा सकता।
राजेंद्रन की अर्जी स्वीकार करते हुए अदालत ने याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया और कहा कि सारे आरोप सच मान लें तब भी इसमें सुनवाई लायक कोई आधार नहीं है। अदालत ने खर्च को लेकर कोई आदेश नहीं दिया और शिवकुमार की जमानत राशि लौटाने का निर्देश दिया।