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मद्रास हाईकोर्ट ने अन्नाद्रमुक के चार विधायकों के इस्तीफे मंजूर करने का स्पीकर का फैसला बरकरार रखा

चारों ने मई में एक ही दिन इस्तीफा देकर टीवीके का दामन थामा था। अदालत ने इस्तीफों को असली माना, लेकिन स्पीकर से उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही दो महीने में पूरी करने को कहा।

संपादकीय डेस्क से · चेन्नईप्रकाशित
मद्रास हाईकोर्ट की इमारत, चेन्नई
मद्रास हाईकोर्ट की इमारत, चेन्नईPhoto: Raki_Man / Wikimedia Commons, CC BY 3.0

मुख्य बातें

  1. हाईकोर्ट ने चारों विधायकों के इस्तीफों को असली और स्वैच्छिक माना।
  2. अदालत ने कहा कि इस्तीफे से पहले के आचरण पर अयोग्यता की कार्यवाही खत्म नहीं होती।
  3. स्पीकर को यह कार्यवाही दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी।

मद्रास हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने मंगलवार को अन्नाद्रमुक के उन चार विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने का तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष का फैसला बरकरार रखा, जिन्होंने एक ही दिन इस्तीफा देकर सत्तारूढ़ टीवीके का दामन थाम लिया था। लेकिन अदालत ने कहा कि इस्तीफों से उनके खिलाफ अयोग्यता के मामले खत्म नहीं होते।

मुख्य न्यायाधीश एस ए धर्माधिकारी और जस्टिस जी अरुल मुरुगन की प्रथम पीठ ने पाया कि इस्तीफे असली थे और स्पीकर से उनकी विस्तृत जांच की अपेक्षा नहीं थी। पीठ ने स्पीकर को दसवीं अनुसूची के तहत लंबित अयोग्यता की कार्यवाही दो महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।

एक ही दिन में इस्तीफा

मामला मई के विश्वास मत से जुड़ा है। मुख्यमंत्री विजय की अगुवाई वाली टीवीके ने 108 सीटें जीती थीं, जो बहुमत से कम थीं, और 13 मई को 144 वोटों से विश्वास मत जीता, जब अन्नाद्रमुक के 25 विधायकों ने पार्टी के व्हिप के खिलाफ जाकर उसका साथ दिया। अगले दिन सभी 25 के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही शुरू हुई, जो बाद में माफी मांगने वालों के खिलाफ वापस ले ली गई।

25 मई को इनमें से चार विधायकों ने इस्तीफे सौंपे, टीवीके के महासचिव से मिले और पार्टी में शामिल हो गए। स्पीकर जे सी डी प्रभाकर ने उसी दिन इस्तीफे स्वीकार कर लिए और राजपत्र अधिसूचना जारी हो गई।

अन्नाद्रमुक ने अपने व्हिप अग्री एस एस कृष्णमूर्ति के जरिए दलील दी कि इतनी जल्दबाजी खरीद-फरोख्त की ओर इशारा करती है, और स्पीकर को जांचना चाहिए था कि इस्तीफे स्वैच्छिक हैं या नहीं, और पहले पार्टी का पक्ष सुनना चाहिए था। वरिष्ठ वकील वी गिरि की अगुवाई में उसके वकीलों ने इस प्रक्रिया को “दिखावा” बताया।

दूसरा पक्ष

स्पीकर ने अदालत को बताया कि उन्होंने हर विधायक से पूछताछ की थी और वे संतुष्ट थे कि कोई दबाव नहीं था। वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने दलील दी कि अनुच्छेद 190 के तहत स्पीकर को यह देखना होता है कि इस्तीफा असली है, लेकिन सदस्य की मंशा की जांच जरूरी नहीं। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि दूसरी पार्टी में जाने से पहले इस्तीफा देना दुर्भावना नहीं है, और किसी सदस्य का पार्टी छोड़ने का अधिकार लोकतंत्र में असहमति का हिस्सा है।

विधानसभा सचिव ने अदालत से कहा कि इस्तीफा स्वीकार होने से कोई सदस्य पहले के आचरण के लिए अयोग्यता से मुक्त नहीं होता। अदालत इससे सहमत हुई, यानी मई में व्हिप की अवहेलना के लिए चारों पूर्व विधायक अब भी अयोग्य ठहराए जा सकते हैं।

एक जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते अन्नाद्रमुक के 21 दूसरे विधायकों के खिलाफ वापस ली गई अयोग्यता कार्यवाही को फिर से खोलने से इनकार कर दिया था।