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बीएनएसएस की धारा 163: निषेधाज्ञा से प्रशासन क्या कर सकता है और उसकी सीमा कहां है

पुरानी धारा 144 का अब नया नंबर है। इस महीने दिल्ली के प्रदर्शनों पर दर्ज मामले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत जारी आदेश तोड़ने के हैं। ऐसा आदेश कौन दे सकता है, यह कितने दिन चलता है और इसे चुनौती कैसे दी जाती है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163, जिसने जुलाई 2024 में पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 की जगह ली, ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या अधिकार प्राप्त किसी दूसरे कार्यकारी मजिस्ट्रेट को जान या सुरक्षा के खतरे, दंगे या सार्वजनिक शांति भंग होने से रोकने के लिए तुरंत लिखित आदेश देने की ताकत देती है। आदेश किसी इलाके में जमावड़े या दूसरे कामों पर रोक लगा सकता है, पर राज्य सरकार की ओर से बढ़ाए बिना यह ज़्यादा से ज़्यादा दो महीने चलता है, और अदालतें कह चुकी हैं कि इसका इस्तेमाल सिर्फ जायज़ विरोध को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।

धारा 163 क्या है?

यह वह आपात शक्ति है जिससे प्रशासन लोगों को कोई काम न करने का आदेश दे सकता है, जैसे किसी इलाके में इकट्ठा न होना, जब उसे लगे कि गड़बड़ी होने वाली है।

दशकों तक यह शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 में थी, इसीलिए बहुत से लोग अब भी कहते हैं कि “धारा 144 लगा दी गई है”। 1 जुलाई 2024 को पुरानी संहिता की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) आई, और यही शक्ति मामूली बदलावों के साथ धारा 163 में चली गई।

आदेश कौन जारी कर सकता है?

ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार की ओर से खास तौर पर अधिकार दिया गया कोई दूसरा कार्यकारी मजिस्ट्रेट।

ये प्रशासनिक अधिकारी होते हैं, जज नहीं। दिल्ली जैसे पुलिस कमिश्नर प्रणाली वाले शहरों में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ये कार्यकारी मजिस्ट्रेट वाली शक्तियां इस्तेमाल करते हैं, इसीलिए राजधानी में निषेधाज्ञा आम तौर पर पुलिस जारी करती है।

आदेश असल में क्या कर सकता है?

यह किसी व्यक्ति, किसी इलाके के निवासियों या किसी जगह आने वाले लोगों को कोई काम रोकने, या अपनी संपत्ति के बारे में कोई खास कदम उठाने का निर्देश दे सकता है।

कानून इसकी इजाज़त तब देता है जब अधिकारी को लगे कि लोगों को बाधा या चोट, जान, सेहत या सुरक्षा के खतरे, सार्वजनिक शांति भंग होने, दंगे या मारपीट को रोकने के लिए तुरंत कदम ज़रूरी है। व्यवहार में इसका मतलब अक्सर किसी तय इलाके में जमावड़े, जुलूस, लाउडस्पीकर या हथियार लेकर चलने पर रोक होता है।

आदेश लिखित होना चाहिए और उसमें उसके पीछे के ठोस तथ्य बताए जाने चाहिए। आपात स्थिति में इसे प्रभावित लोगों को पहले सुने बिना भी जारी किया जा सकता है।

क्या इसका मतलब चार या ज़्यादा लोगों के मिलने पर रोक है?

अपने आप में नहीं। कानून कोई संख्या तय नहीं करता। “चार या ज़्यादा लोग इकट्ठा न हों” वाली जानी-पहचानी बात बस इतनी है कि कई आदेश इसी तरह लिखे जाते हैं। किस बात पर रोक है, यह हर आदेश के शब्दों पर निर्भर करता है, इसीलिए दिल्ली में इस हफ्ते वकीलों ने आदेश दिखाने पर ज़ोर दिया है। 12 अक्टूबर को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि धारा 163 का कोई आदेश सार्वजनिक नहीं किया गया है।

यह कितने दिन चल सकता है?

ज़्यादा से ज़्यादा दो महीने। राज्य सरकार अधिसूचना के ज़रिए इसे छह महीने और बढ़ा सकती है, पर तभी जब उसे जान, सेहत या सुरक्षा के खतरे, या दंगे या मारपीट को रोकने के लिए यह ज़रूरी लगे।

धारा 163 चार आंकड़ों में

  • 1 जुलाई 2024जब बीएनएसएस ने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की जगह ली
  • 2 महीनेआदेश अपने आप ज़्यादा से ज़्यादा इतने दिन चल सकता है
  • 6 महीनेराज्य सरकार इतना और बढ़ा सकती है
  • धारा 223भारतीय न्याय संहिता की, ऐसे आदेश की अवहेलना का अपराध

इसे तोड़ने पर क्या होता है?

कानूनी रूप से जारी आदेश की अवहेलना भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत अपराध है, जो पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 188 की जगह आई है। बिना अनुमति वाले प्रदर्शनों के बाद एफआईआर में अक्सर यह धारा जोड़ी जाती है। मसलन, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक इंडिया गठबंधन के मार्च पर दर्ज मामलों में धारा 163 के आदेशों के उल्लंघन और बैरिकेड तोड़ने के आरोप हैं।

आदेश का उल्लंघन और गैरकानूनी जमावड़ा एक ही बात नहीं है। गैरकानूनी जमावड़ा अपनी अलग शर्तों वाला अलग अपराध है।

क्या आदेश को चुनौती दी जा सकती है?

हां, दो तरह से। कोई भी प्रभावित व्यक्ति आदेश जारी करने वाले मजिस्ट्रेट या किसी वरिष्ठ मजिस्ट्रेट से उसे रद्द करने या बदलने की अर्ज़ी दे सकता है। अगर बात न बने, तो मौलिक अधिकारों पर अनुचित पाबंदी बताकर आदेश को हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

संविधान का अनुच्छेद 19 शांतिपूर्वक और बिना हथियार इकट्ठा होने और देश में कहीं भी आने-जाने का अधिकार देता है। सरकार इन पर सिर्फ उचित पाबंदी लगा सकती है, सार्वजनिक व्यवस्था जैसे कारणों से।

अदालतों ने क्या कहा है?

कि यह शक्ति वैध है, पर इसका इस्तेमाल सोच-समझकर और खुले तौर पर होना चाहिए।

जनवरी 2020 के अनुराधा भसीन मामले में, जो जम्मू-कश्मीर की पाबंदियों से जुड़ा था, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुरानी धारा 144 के आदेश ठोस तथ्यों पर आधारित होने चाहिए ताकि अदालत में उनकी जांच हो सके, उनमें खतरे के मुकाबले अधिकारों को तौला जाना चाहिए, और उनका इस्तेमाल राय या शिकायत की जायज़ अभिव्यक्ति दबाने के लिए नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि एक ही स्थिति के लिए बार-बार आदेश जारी करना शक्ति का दुरुपयोग होगा।

यही कसौटी अब धारा 163 पर लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट में हिरासत और अवमानना की याचिकाओं की सुनवाई के दौरान इस महीने दिल्ली में जारी आदेशों को इसी पैमाने पर परखा जाएगा।

मूल दस्तावेज़