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एसआईआर पर इंडिया गठबंधन की सुप्रीम कोर्ट याचिका में क्या मांगा गया है

राहुल गांधी और विपक्ष के 10 और नेता चाहते हैं कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण रोका जाए, उसके रिकॉर्ड सामने आएं और नाम कटने की जांच हो। वे क्या मांग रहे हैं, किन कानूनी आधारों पर, और चुनाव आयोग क्या कहता है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

12 अक्टूबर को राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के 10 और नेताओं ने चुनाव आयोग और उसके तीनों आयुक्तों के खिलाफ याचिका दायर की। इसमें सुप्रीम कोर्ट से मांग है कि सुनवाई पूरी होने तक सभी राज्यों में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) रोका जाए। याचिका में एसआईआर से जुड़े आयोग के अंदरूनी रिकॉर्ड, सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज की अगुवाई वाली समिति से नाम कटने की जांच, बूथ-वार हटाए गए मतदाताओं की सूची और बिना नोटिस व सुनवाई के किसी का नाम न काटने का नियम भी मांगा गया है। चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर के उसके फैसले सर्वसम्मत थे और सुप्रीम कोर्ट उन्हें सही ठहरा चुका है।

याचिका क्या है?

यह इंडिया गठबंधन के 11 नेताओं की ओर से 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दायर रिट याचिका है, जो मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भारत निर्वाचन आयोग के खिलाफ है। मामले का नाम राहुल गांधी बनाम भारत निर्वाचन आयोग है और इसकी डायरी संख्या 64196/2026 है। यह एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड एस प्रसन्ना के ज़रिए उसी समय दायर की गई, जब अदालत की ओर बढ़ रहे विपक्ष के मार्च को पुलिस ने रोका।

याचिकाकर्ता हैं कांग्रेस के राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव (सपा), तेजस्वी यादव (राजद), सौगत रॉय (टीएमसी), सुप्रिया सुले (एनसीपी-एसपी), संजय राउत (शिवसेना-यूबीटी), डी राजा (सीपीआई), एम ए बेबी (सीपीआई-एम), महुआ माझी (झामुमो) और ई टी मोहम्मद बशीर (आईयूएमएल)। प्रतिवादी हैं चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी।

याचिका में अदालत से क्या मांगा गया है?

मुख्य मांग यह है कि याचिका पर फैसला होने तक सभी राज्यों में एसआईआर स्थगित किया जाए। कुल 10 राहतें मांगी गई हैं। प्रमुख ये हैं:

  • एसआईआर से जुड़ी आयोग की फाइलें, बैठकों का ब्योरा, नोटिंग और उसके ईसीआईनेट व ईआरओनेट सिस्टम के एक्सेस लॉग सामने लाए जाएं, जिसमें 24 जून 2025 को एसआईआर शुरू करने के फैसले की पूरी फाइल भी शामिल हो।
  • इन फैसलों की वैधता की जांच हो, और बिना कानूनी अधिकार के लिए गए फैसले रद्द हों।
  • मतदाता सूची बनाने से जुड़े कानून तोड़ने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
  • सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज की अगुवाई में तकनीकी विशेषज्ञों वाली समिति बने, जो एसआईआर में नाम कटने, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और ईवीएम प्रक्रियाओं की जांच करे।
  • हटाए गए मतदाताओं की बूथ-वार सूची कारणों और उम्र व लिंग के ब्योरे के साथ जारी हो, और गलत तरीके से हटाए गए नाम वापस जोड़ने की व्यवस्था बने।
  • बिना नोटिस और सुनवाई के किसी का नाम न काटा जाए, और पंजाब व चुनाव वाले दूसरे राज्यों के पात्र मतदाता कानूनी अंतिम तारीख तक नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकें।

जितनी जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग नहीं है। यह मांग सड़क पर हो रहे प्रदर्शनों की रही है; मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होना ज़रूरी है।

याचिका एक नज़र में

  • 64196/2026सुप्रीम कोर्ट डायरी संख्या
  • 11याचिकाकर्ता, इंडिया गठबंधन के 10 दलों से
  • 4प्रतिवादी: चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त
  • 10मांगी गई राहतें, सबसे ऊपर सभी राज्यों में एसआईआर पर रोक

याचिका किन कानूनों पर टिकी है?

याचिका अदालत से कहती है कि वह एसआईआर के फैसलों को संविधान के अनुच्छेद 324 की कसौटी पर परखे, जो चुनावों पर चुनाव आयोग के अधिकारों से जुड़ा प्रावधान है। यह मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी सहारा लेती है, जिसका अर्थ याचिकाकर्ता यह निकालते हैं कि फैसले पूरे आयोग को मिलकर लेने चाहिए और उनका ब्योरा दर्ज होना चाहिए। साथ ही आयोग के कामकाज पर टी एन शेषन फैसले के सिद्धांतों का हवाला है।

अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए याचिका जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 का हवाला देती है। फॉर्म के मामले में यह मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 पर टिकी है, जो फॉर्म 6 का प्रारूप तय करते हैं।

आयुक्तों को व्यक्तिगत रूप से पक्षकार क्यों बनाया गया?

क्योंकि याचिका का एक आधार यह दावा है कि एसआईआर के फैसले पूरे आयोग की सहमति के बिना लिए गए। सितंबर में एक अखबार की रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई, जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे। आयोग ने जवाब दिया, “ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का नतीजा हैं” और “अलग-अलग राय और टिप्पणियां किसी भी संस्था में विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा होती हैं।”

फॉर्म 6 का मामला क्या है?

याचिका मांग करती है कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाने वाला ऑनलाइन फॉर्म 6, 1960 के नियमों में तय प्रारूप के अनुरूप हो। आयोग ने इस फॉर्म के साथ एसआईआर की एक घोषणा जोड़ी थी। 5 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा था, “फॉर्म 6 में किसी भी बदलाव को हमने मंज़ूरी नहीं दी है।” आयोग का पक्ष है कि “एसआईआर के लिए फॉर्म 6 के साथ लगी घोषणा को माननीय सुप्रीम कोर्ट सही ठहरा चुका है।”

दूसरा पक्ष क्या कहता है?

चुनाव आयोग और भाजपा का कहना है कि एसआईआर वैध है और अदालत में परखा जा चुका है। आयोग के मुताबिक बिहार एसआईआर का 24 जून 2025 का आदेश “आयोग की सर्वसम्मत मंज़ूरी से जारी किया गया था” और सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने फैसले में उसे सही ठहराया। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश पासवान ने विपक्ष के दावों को “निराधार” बताया और कहा, “सुप्रीम कोर्ट एसआईआर की संवैधानिकता पर पहले ही फैसला दे चुका है।”

आगे क्या होगा?

एसआईआर से जुड़े दूसरे मामले 13 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थे, और मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया था कि विपक्ष की याचिका भी उनके साथ सुनी जा सकती है। अदालत चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांग सकती है, रोक जैसी अंतरिम राहत दे या ठुकरा सकती है, या मामले को लंबित मामलों के साथ जोड़ सकती है। देशभर में रोक का कोई भी आदेश कई राज्यों में चल रहे पुनरीक्षण पर असर डालेगा, जिनमें पंजाब जैसे चुनाव वाले राज्य भी हैं।