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चुनाव आयोग में असहमति की रिपोर्ट के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की विपक्ष की मुहिम फिर तेज़

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक दो चुनाव आयुक्तों ने एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई। चुनाव आयोग का कहना है कि अलग राय सामान्य बात है और उसके फैसले सर्वसम्मत रहे।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
2025 में आईआईआईडीईएम के एक कार्यक्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार
2025 में आईआईआईडीईएम के एक कार्यक्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमारSharma Dhawan / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. इंडियन एक्सप्रेस ने 23 सितंबर को रिपोर्ट किया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित में आपत्ति दर्ज की।
  2. चुनाव आयोग ने कहा कि लिखित नोट और अलग राय विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं और पिछले एक साल में उसके फैसले सर्वसम्मत रहे।
  3. इंडिया गठबंधन के दलों ने कहा कि वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए तीसरा नोटिस तैयार कर रहे हैं; 11 अक्टूबर तक ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली जो इसके सौंपे जाने की पुष्टि करे।
  4. 6 और 7 अक्टूबर के प्रदर्शनों के बाद दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य के नाम से कम से कम चार एफआईआर दर्ज कीं; किसी अदालत ने इन पर फैसला नहीं दिया है।

एक रिपोर्ट में कहा गया कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसलों पर बार-बार आपत्ति जताई। इसके बाद विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की तीसरी कोशिश की तैयारी कर रहे हैं। भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने इस बात को खारिज किया है कि इन आपत्तियों से किसी गड़बड़ी का संकेत मिलता है।

इंडियन एक्सप्रेस ने क्या रिपोर्ट किया

23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर लिखित में आपत्ति दर्ज की, जो उनके मुताबिक एसआईआर को देशभर में लागू करने के दौरान उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए। एएनआई और द वीक की ओर से दिए गए रिपोर्ट के सार के मुताबिक, ये आपत्तियां फॉर्म 6 (मतदाता के रूप में पंजीकरण का वैधानिक फॉर्म) में बदलाव, मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने और हटाने, और मतदाता सूची डेटाबेस पर केंद्रीकृत नियंत्रण से जुड़ी थीं।

आयोग का जवाब

चुनाव आयोग ने उसी दिन जवाब दिया। उसने कहा, “आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में काम करता है,” और “लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक नियंत्रण व संतुलन मानक और लगातार चलने वाली प्रक्रियाएं हैं।” उसने आगे कहा:

ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का नतीजा हैं।

भारत निर्वाचन आयोग, बयान, 23 सितंबर 2026 (एएनआई)

आयोग ने यह भी कहा कि सिर्फ तीनों आयुक्त ही नहीं, हर अधिकारी सुझाव देने के लिए अधिकृत है, और वह “पूरी ईमानदारी के साथ अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”

विपक्ष के कदम

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 23 सितंबर को एक्स पर लिखा: “वोट चोरी भारत की जनता के खिलाफ अपराध है और हमारे संविधान पर सीधा हमला है।” एएनआई के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव, अभिषेक बनर्जी और जॉन ब्रिटास ने भी आयोग की आलोचना की।

24 सितंबर को द वीक ने पीटीआई के हवाले से रिपोर्ट किया कि इंडिया गठबंधन के दल दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का नया नोटिस तैयार कर रहे हैं, जिसे कानूनी जांच के बाद दाखिल किया जाएगा। 11 अक्टूबर तक इस डेस्क को ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली जिसमें कहा गया हो कि यह नोटिस सौंप दिया गया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष के कदम

  1. 12 मार्च 2026लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिसों में अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग।
  2. 6 अप्रैल 2026लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने दोनों नोटिस स्वीकार करने से इनकार किया।
  3. 24 अप्रैल 202673 सांसदों ने नौ आरोपों के साथ राज्यसभा में दूसरा नोटिस दिया; यह लंबित है।
  4. 23 सितंबर 2026इंडियन एक्सप्रेस ने दो चुनाव आयुक्तों की असहमति की रिपोर्ट दी; आयोग ने कहा कि फैसले सर्वसम्मत थे।
  5. 24 सितंबर 2026इंडिया गठबंधन के दलों ने कहा कि दोनों सदनों के लिए तीसरा नोटिस तैयार किया जा रहा है।
  6. 6-7 अक्टूबर 2026मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में विपक्ष का प्रदर्शन; दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज कीं।

पीटीआई के मुताबिक, मार्च के नोटिसों में “पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण” और “बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने” के आरोप लगाए गए थे। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत इन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया। राज्यसभा की अधिसूचना में इस फैसले को “सावधानीपूर्वक और वस्तुनिष्ठ आकलन” के बाद लिया गया बताया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह ही, साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है।

प्रदर्शन, एफआईआर और अदालतें

विपक्षी नेताओं ने 6 और 7 अक्टूबर को मध्य दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। पीटीआई के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य के नाम से कम से कम चार एफआईआर दर्ज कीं, जिनमें मारपीट, सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने और बीएनएसएस की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा के उल्लंघन के आरोप हैं। एक अलग एफआईआर में आकाशवाणी भवन में जबरन घुसने का आरोप है। पुलिस ने कहा कि कई सांसदों समेत 91 लोगों को हिरासत में लिया गया। ये पुलिस मामले हैं; किसी अदालत ने इन पर फैसला नहीं दिया है। यूएनआई के मुताबिक, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा: “यह शैतानी जोड़ी घबराई हुई, बौखलाई हुई और हताश है।”

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) भी इस मामले से जुड़ा है। पीटीआई के मुताबिक, 5 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा, “फॉर्म 6 में किसी भी बदलाव को हमने मंजूरी नहीं दी है।” आईएएनएस के मुताबिक, पीठ ने उस याचिका पर नोटिस जारी किया जिसमें पूछा गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त पूर्ण आयोग को मिली शक्तियों का अकेले इस्तेमाल कर सकते हैं। राहुल गांधी ने एक्स पर कहा कि अब “यह बिना किसी संदेह के साबित हो गया है कि ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म 6 को अवैध रूप से और एकतरफा बदला”। पीटीआई के मुताबिक, आयोग ने उनके दावों को भ्रामक बताया और कहा कि फॉर्म 6 के घोषणापत्र को अदालत ने सही ठहराया है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के मुताबिक, 23 सितंबर को दो न्यायाधीशों की पीठ इस पर बंटी रही कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को दी गई चुनौती के लिए बड़ी पीठ की ज़रूरत है या नहीं, और फिर उसने सर्वसम्मति से कागज़ात मुख्य न्यायाधीश को भेज दिए ताकि वे संविधान पीठ गठित करें।