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समझिएचुनाव आयोग

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है, और उन्हें कैसे हटाया जाता है

2023 के कानून के तहत प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली चयन समिति मुख्य चुनाव आयुक्त चुनती है, और यह कानून अब संविधान पीठ के सामने है। उन्हें हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी है।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

2023 के कानून के तहत राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति एक समिति की सलाह पर करते हैं, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह हटाया जा सकता है: साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर, संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से।

चुनाव आयोग को कौन चलाता है?

भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) तीन सदस्यों वाली संस्था है: एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त। मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं, जो पूर्व केंद्रीय सचिव हैं, मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त बने और फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त हैं। आयोग ने 23 सितंबर 2026 के एक बयान में अपने बारे में कहा, “आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में काम करता है।”

मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन कैसे होता है?

राष्ट्रपति तीन सदस्यों वाली चयन समिति की सिफारिश पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के तहत इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होते हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, उम्मीदवार ऐसे अधिकारी होने चाहिए जो सचिव स्तर पर हों या रहे हों और जिन्हें चुनाव प्रबंधन का अनुभव हो। समिति उन नामों पर भी विचार कर सकती है जो उसके लिए बनी सूची में नहीं हैं, और समिति में कोई पद खाली होने पर भी उसकी सिफारिश वैध रहती है।

ज्ञानेश कुमार को फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विपक्ष के नेता राहुल गांधी की समिति ने चुना। Scroll के अनुसार, राहुल गांधी ने असहमति नोट दिया और सरकार से कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कानून को दी गई चुनौती पर फैसला आने तक नियुक्ति टाल दी जाए।

मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल कितना होता है?

छह साल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, और दोबारा नियुक्ति नहीं होती। पीआरएस के अनुसार, अगर किसी चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाता है, तब भी कुल कार्यकाल छह साल से ज़्यादा नहीं हो सकता। Scroll के अनुसार, ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है।

नियुक्ति वाला कानून सुप्रीम कोर्ट में क्यों है?

क्योंकि इसने अदालत के आदेश से बनी उस समिति की जगह ली, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे। 2 मार्च 2023 को अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, नियुक्तियां प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर होंगी। 2023 के अधिनियम ने मुख्य न्यायाधीश की जगह एक कैबिनेट मंत्री को रख दिया। जया ठाकुर बनाम भारत संघ मामले में याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे चयन पर कार्यपालिका का नियंत्रण हो जाता है। कानून पर रोक नहीं लगी है: कोर्ट ने जनवरी और मार्च 2024 में अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

Supreme Court Observer के अनुसार, 23 सितंबर 2026 को दो न्यायाधीशों की पीठ इस बात पर बंटी हुई थी कि मामला बड़ी पीठ को भेजा जाए या नहीं, फिर उसने सर्वसम्मति से कागज़ात मुख्य न्यायाधीश को भेज दिए ताकि संविधान पीठ बनाई जा सके।

मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?

सिर्फ उसी तरीके से और उन्हीं आधारों पर जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को: साबित कदाचार या अक्षमता। यह सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 324(5) से मिलती है, जिसे अनुच्छेद 124(4) के साथ पढ़ा जाता है। Deccan Chronicle के अनुसार, प्रस्ताव के नोटिस पर कम से कम 100 लोकसभा सदस्यों या 50 राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति तय करते हैं कि नोटिस स्वीकार किया जाए या नहीं; स्वीकार होने पर एक समिति आरोपों की जांच करती है। इसके बाद प्रस्ताव को हर सदन में उसकी कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना होता है।

चुनाव आयुक्तों के लिए अलग सुरक्षा है: पीआरएस के अनुसार, उन्हें सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना: अहम आंकड़े

  • 100हटाने के नोटिस पर हस्ताक्षर के लिए ज़रूरी लोकसभा सांसद
  • 50हटाने के नोटिस पर हस्ताक्षर के लिए ज़रूरी राज्यसभा सांसद
  • दो-तिहाईहर सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का, साथ में कुल सदस्य संख्या का बहुमत
  • 6 साल या 65 सालमुख्य चुनाव आयुक्त का अधिकतम कार्यकाल, जो भी पहले हो

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त बाकी दो आयुक्तों के बिना फैसले ले सकते हैं?

यह सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है। IANS के अनुसार, 5 अक्टूबर 2026 को कोर्ट ने उस याचिका पर नोटिस जारी किया जिसमें पूछा गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं जो बहु-सदस्यीय आयोग में निहित हैं। इसके अलावा, ANI के सारांश के अनुसार, इंडियन एक्सप्रेस ने 23 सितंबर को बताया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज की, जिनमें ऐसे आदेश भी थे जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी जानकारी के बिना जारी हुए। चुनाव आयोग का जवाब था कि लिखित नोट और अलग राय विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं, और “ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का नतीजा हैं।”

क्या ज्ञानेश कुमार को हटाने की कोशिश हुई है?

हां। विपक्षी दलों ने 2026 में दो बार नोटिस दिए हैं और उनका कहना है कि तीसरा नोटिस तैयार हो रहा है। इनमें से किसी पर भी मतदान नहीं हुआ है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के नोटिस

  1. 12 मार्च 2026130 लोकसभा और 63 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिस, जिनमें 'पद पर पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण' और 'बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने' का आरोप लगाया गया।
  2. 6 अप्रैल 2026लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने दोनों नोटिस स्वीकार करने से इनकार किया।
  3. 24 अप्रैल 202673 सांसदों के हस्ताक्षर और नौ आरोपों वाला दूसरा नोटिस राज्यसभा में दिया गया; अभी लंबित है।
  4. 24 सितंबर 2026इंडिया गठबंधन के दलों ने कहा कि दोनों सदनों के लिए तीसरे नोटिस का मसौदा तैयार हो रहा है।

चुनाव आयोग ने “वोट चोरी” के आरोप को “एक भ्रामक नैरेटिव का हिस्सा” बताया है, और सितंबर में दोनों चुनाव आयुक्तों की असहमति पर इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद कहा कि पिछले एक साल के उसके फैसले सर्वसम्मत थे। हमारी खबर में दोनों पक्षों की बात है।

मूल दस्तावेज़