LokVox

राजनीतिदल-बदल

एआईएडीएमके के 21 विधायकों की अयोग्यता का मामला दोबारा खोलने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

इन विधायकों ने पार्टी व्हिप के खिलाफ जाकर टीवीके सरकार के पक्ष में वोट दिया था और बाद में पार्टी ने उन्हें माफ कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसा मामला सदन का सदस्य ही आगे बढ़ा सकता है, और कानूनी सवाल खुले छोड़ दिए।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
चेन्नई का फोर्ट सेंट जॉर्ज, जहां तमिलनाडु विधानसभा स्थित है
चेन्नई का फोर्ट सेंट जॉर्ज, जहां तमिलनाडु विधानसभा स्थित हैJan Van Ryne (1712–60); Publisher: Robert Sayer / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. 9 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ याचिका खारिज करने के मद्रास हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार किया।
  2. ये 21 विधायक उन एआईएडीएमके के 25 विधायकों में शामिल थे, जिन्होंने 13 मई को पार्टी व्हिप के बावजूद मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की टीवीके सरकार के पक्ष में वोट दिया।
  3. एआईएडीएमके महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी के लिखित में विधायकों को माफ करने के बाद अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर ने 9 जून को कार्यवाही खत्म कर दी।
  4. पीठ ने कानूनी सवाल खुले छोड़ दिए, यानी पार्टी की माफी से दल-बदल का मामला खत्म हो सकता है या नहीं, यह अभी तय नहीं हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने 9 अक्टूबर को तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले के खिलाफ याचिका सुनने से इनकार कर दिया, जिसमें एआईएडीएमके के 21 विधायकों पर अयोग्यता की कार्यवाही खत्म कर दी गई थी। इन विधायकों ने विश्वास प्रस्ताव में पार्टी व्हिप के खिलाफ जाकर तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) सरकार के पक्ष में वोट दिया था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने पी.वी. सेल्वकुमार की जनहित याचिका खारिज करने के मद्रास हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) के फैसले में दखल देने से इनकार किया। पीठ ने कानूनी सवालों को खुला छोड़ दिया, ताकि उन पर किसी उचित कार्यवाही में विचार हो सके।

मामला कैसे शुरू हुआ

2026 के विधानसभा चुनाव में टीवीके को 108 सीटें मिलीं, जो बहुमत के लिए ज़रूरी 118 से कम थीं। 13 मई को विश्वास प्रस्ताव में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार को 144 वोट मिले। एस.पी. वेलुमणि और सी. विजयभास्कर की अगुवाई में एआईएडीएमके के 25 विधायकों ने विरोध में वोट देने के व्हिप के बावजूद सरकार के पक्ष में वोट दिया।

एआईएडीएमके महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने दसवीं अनुसूची, यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत सभी 25 को अयोग्य ठहराने की मांग की, और 14 मई को कार्यवाही शुरू हुई। बाद में 25 में से चार ने एआईएडीएमके छोड़ दी और टीवीके में शामिल हो गए। बाकी 21 के लिए पलानीस्वामी ने अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनके आचरण को माफ कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर ने ये पत्र स्वीकार किए और 9 जून को कार्यवाही खत्म कर दी।

एआईएडीएमके के 21 विधायकों का मामला

  1. 13 मई 2026एआईएडीएमके के 25 विधायकों ने पार्टी व्हिप के खिलाफ विश्वास प्रस्ताव में टीवीके सरकार के पक्ष में वोट दिया।
  2. 14 मई 2026दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्यवाही शुरू हुई।
  3. 9 जून 2026पार्टी की माफी के बाद विधानसभा अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर ने 21 विधायकों पर कार्यवाही खत्म की।
  4. 18 अगस्त 2026मद्रास हाईकोर्ट ने पी.वी. सेल्वकुमार की जनहित याचिका खारिज की।
  5. 9 अक्टूबर 2026सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार किया और कानूनी सवाल खुले छोड़े।

याचिकाकर्ता की दलील

सेल्वकुमार ने खुद को एआईएडीएमके का सदस्य और मतदाता बताया। उनकी दलील थी कि कोई पार्टी व्हिप तोड़ने वाले विधायकों को माफ करके अयोग्यता का मामला बंद नहीं करा सकती। हाईकोर्ट में उनकी दलील थी कि अध्यक्ष का माफी को स्वीकार करना संवैधानिक तमाशा है।

सुप्रीम कोर्ट में उनकी वकील नीना नरीमन ने कहा कि अध्यक्ष ने अयोग्यता याचिका एक बार स्वीकार कर ली थी, तो उसे अंजाम तक ले जाना चाहिए था, और व्हिप के खिलाफ वोट देकर विधायकों ने साफ तौर पर दल-बदल किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया, जिसमें किसी पार्टी के सभी विधायकों के दल बदलने पर तीसरे पक्ष को राहत दी गई थी, हालांकि उन्होंने माना कि इस मामले में कुछ ही विधायकों ने ऐसा किया।

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता विजय नारायण ने हाईकोर्ट में कहा था कि यह पार्टी और उसके सदस्यों के बीच का मामला है, जिसे कोई बाहरी व्यक्ति चुनौती नहीं दे सकता।

अदालतों ने क्या कहा

मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की हाईकोर्ट पीठ ने 18 अगस्त को याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि पार्टी ने कानून में तय 15 दिनों के भीतर विधायकों को माफ कर दिया था। पीठ की टिप्पणी थी, “उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया है। याचिकाकर्ता तीसरा पक्ष है।”

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बागची ने कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत कार्यवाही सदन के किसी सदस्य को ही आगे बढ़ानी होगी। उन्होंने कहा, “हम पूरी तरह आपके साथ हैं कि संवैधानिक जनादेश की पवित्रता बनी रहनी चाहिए।” पीठ ने कहा कि एआईएडीएमके नेतृत्व ने विधायकों के आचरण को माफ कर दिया लगता है, और टिप्पणी की: “वे एआईएडीएमके में बने हुए हैं।”

हमारे यहां बहुदलीय व्यवस्था है। कोई कह सकता है कि मैं पार्टी बी की जगह पार्टी सी को सत्ता में देखना पसंद करता हूं।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, 9 अक्टूबर 2026 की सुनवाई

पीठ ने यह भी कहा, “अगर पार्टी ने अर्ज़ी दी होती, तो हम समझ सकते थे,” और याचिकाकर्ता पक्ष से कहा कि “ऐसा लगता है कि आप ज़्यादा से ज़्यादा एक मौकापरस्त दखलअंदाज़ हैं”, या “ज़्यादा से ज़्यादा अल्पमत विचार पर चलने वाले एक विवेकशील व्यक्ति”।

क्या अब भी खुला है

पीठ ने कानूनी सवाल खुले छोड़े हैं, इसलिए अदालत ने यह तय नहीं किया है कि अध्यक्ष के मामला हाथ में लेने के बाद पार्टी की माफी से दल-बदल की कार्यवाही खत्म हो सकती है या नहीं। अगर कोई पार्टी या सदन का सदस्य अदालत जाता है, तो यह सवाल फिर उठ सकता है।