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दल-बदल विरोधी कानून क्या है, आसान भाषा में समझिए

दसवीं अनुसूची पाला बदलने वाले सांसदों और विधायकों को सज़ा देती है, लेकिन दो-तिहाई सदस्यों के विलय की छूट है और फैसला अध्यक्ष करते हैं। 2026 में इन दोनों नियमों की परीक्षा हुई।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

संविधान की दसवीं अनुसूची उस सांसद या विधायक को अयोग्य ठहराती है जो अपनी मर्ज़ी से पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है। अगर विधायक दल के दो-तिहाई सदस्य विलय पर सहमत हों तो सदस्य अयोग्यता से बच जाते हैं। हर मामले का फैसला लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति करते हैं, जिसकी अदालतें सीमित समीक्षा कर सकती हैं।

दल-बदल विरोधी कानून क्या है?

यह संविधान की दसवीं अनुसूची है, जो उन सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराती है जो उस पार्टी को छोड़ देते हैं जिसके टिकट पर वे चुने गए थे। इसका मकसद चुनाव के बाद जनप्रतिनिधियों को पाला बदलने से रोकना है। जिस सदस्य को दल-बदल का दोषी पाया जाता है, उसकी सदन की सदस्यता चली जाती है।

किन सांसदों-विधायकों को अयोग्य ठहराया जा सकता है, और किस आधार पर?

किसी पार्टी के सदस्य को अपनी मर्ज़ी से पार्टी की सदस्यता छोड़ने पर, या बिना अनुमति पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट देने या वोटिंग से गैरहाज़िर रहने पर अयोग्य ठहराया जा सकता है। पैराग्राफ 2(1) में यही दो आधार हैं। अगर पार्टी 15 दिनों के भीतर व्हिप के खिलाफ दिए गए वोट को माफ कर दे, तो वह अयोग्यता का आधार नहीं बनता।

यह अनुसूची उन सदस्यों पर भी लागू होती है जो चुने जाते समय किसी पार्टी में नहीं थे:

  • कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए, तो वह अयोग्य हो जाता है।
  • मनोनीत सदस्य सदन में सीट ग्रहण करने के छह महीने के भीतर किसी पार्टी में शामिल हो सकता है। उसके बाद शामिल होने पर अयोग्यता होती है।

पार्टी बदलने की छूट कब मिलती है?

सिर्फ ऐसे विलय के ज़रिए, जिसे विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन हो। पैराग्राफ 4 के तहत सदस्य तब सुरक्षित रहते हैं जब उनकी मूल पार्टी किसी दूसरी पार्टी में मिल जाए और वे विलय के बाद बनी पार्टी में शामिल हो जाएं, या जब वे विलय को स्वीकार न करें और अलग समूह के रूप में बैठें। विलय तभी माना जाता है जब “संबंधित विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य ऐसे विलय के लिए सहमत हों”।

पहले एक दूसरा रास्ता भी था। पैराग्राफ 3 किसी विधायक दल के एक-तिहाई सदस्यों की “टूट” को संरक्षण देता था, लेकिन संविधान (91वां संशोधन) अधिनियम, 2003 ने इसे हटा दिया।

पीठासीन अधिकारियों को पैराग्राफ 5 के तहत अलग छूट है। लोकसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या राज्यसभा के उपसभापति पद संभालने पर अपनी पार्टी छोड़ दें तो वे अयोग्य नहीं होते, बशर्ते पद पर रहते हुए वे उसी पार्टी में दोबारा शामिल न हों या किसी दूसरी पार्टी में न जाएं।

चार आंकड़ों में दसवीं अनुसूची

  • 2/3विधायक दल का वह हिस्सा जिसका विलय पर सहमत होना ज़रूरी है
  • 15 दिनव्हिप के खिलाफ दिए गए वोट को माफ करने के लिए पार्टी के पास समय
  • 6 महीनेमनोनीत सदस्य के किसी पार्टी में शामिल होने की अवधि
  • 3 महीनेसुप्रीम कोर्ट के मुताबिक किसी याचिका पर फैसले के लिए अध्यक्ष को सामान्यतः लगने वाला समय

दल-बदल पर फैसला कौन करता है, और क्या अदालत दखल दे सकती है?

फैसला लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति करते हैं और वह अंतिम होता है, लेकिन अदालतें सीमित आधारों पर उसकी समीक्षा कर सकती हैं। पैराग्राफ 6 पीठासीन अधिकारी को अयोग्यता पर फैसला करने का अधिकार देता है। पैराग्राफ 7 ने इस विषय को पूरी तरह अदालतों के दायरे से बाहर रखने की कोशिश की थी।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने किहोतो होलोहन बनाम ज़चिल्हु मामले में, जो 1992 में रिपोर्ट हुआ, पैराग्राफ 7 को अवैध ठहराया। LiveLaw के अनुसार, कोर्ट ने अध्यक्ष के फैसले को अंतिम तो माना, लेकिन क्षेत्राधिकार की गलती, दुर्भावना, संवैधानिक आदेश के उल्लंघन या प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की स्थिति में उसे न्यायिक समीक्षा के दायरे में रखा। अध्यक्ष के फैसले से पहले अदालतें दखल नहीं दे सकतीं।

क्या अध्यक्ष के लिए फैसले की कोई समय-सीमा है?

संविधान में नहीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तीन महीने सामान्य मानक है। LiveLaw के अनुसार, कैशम मेघचंद्र सिंह (2020) मामले में कोर्ट ने कहा कि अध्यक्ष को अयोग्यता याचिका पर उचित समय में फैसला करना चाहिए, जिसका मतलब है, असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर, याचिका दायर होने से तीन महीने।

कोर्ट ने जुलाई 2025 में इस समय-सीमा का इस्तेमाल किया। 31 जुलाई 2025 को पाडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य मामले में उसने तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष से कहा कि कांग्रेस में शामिल हुए बीआरएस के 10 विधायकों के खिलाफ याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर फैसला करें। LiveLaw के अनुसार, अध्यक्ष के कार्रवाई न करने पर अवमानना की कार्यवाही शुरू हुई। अध्यक्ष ने बाकी याचिकाओं का निपटारा 12 मार्च 2026 को किया।

2026 में किन मामलों ने इस कानून की परीक्षा ली?

संसद में पाला बदलने के तीन मामले, और तीनों में विलय का रास्ता अपनाया गया।

संसद में दल-बदल के मामले, 2026

  1. अप्रैल 2026आप के राज्यसभा के 10 में से सात सांसदों ने भाजपा में अपने 'विलय' को मान्यता देने के लिए सभापति को आवेदन दिया। Bar & Bench की रिपोर्ट के अनुसार सभापति ने इसे स्वीकार कर लिया है।
  2. 22 जून 2026शिवसेना (यूबीटी) के नौ में से छह लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में चले गए। उनकी पार्टी ने उनकी अयोग्यता की मांग की।
  3. 18 जुलाई 2026लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शिवसेना के विलय को मंज़ूरी दी और एनसीपीआई में विलय की घोषणा करने वाले तृणमूल के 20 बागी सांसदों को अलग बैठने की अनुमति दी।
  4. 1 सितंबर 2026The Tribune ने बताया कि एनसीपीआई की मान्यता का मामला अब भी अध्यक्ष के पास लंबित है।

Deccan Chronicle के अनुसार, शिवसेना के विलय के बाद शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी के लोकसभा सांसदों की संख्या 13 हो गई। तृणमूल के 20 बागी उन 29 सांसदों में से थे जिन्हें पार्टी ने 2024 में जिताया था।

सांसद गंवाने वाली दोनों पार्टियों ने उनकी अयोग्यता की मांग की है। Deccan Chronicle के अनुसार, शिवसेना (यूबीटी) सांसद अनिल देसाई ने कहा, “किसी विधायक दल का कोई समूह अपने दम पर किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता, भले ही उसके पास दो-तिहाई बहुमत हो।” उसी रिपोर्ट के अनुसार, तृणमूल के अभिषेक बनर्जी ने 20 अयोग्यता याचिकाएं दायर कीं और दलील दी कि पूरी पार्टी के दो-तिहाई समर्थन के बिना विधायक वैध विलय का दावा नहीं कर सकते।

दल-बदल कानून के आलोचक क्या कहते हैं?

उनका कहना है कि विलय की छूट दल-बदल का दरवाज़ा बन गई है, और अध्यक्ष फैसलों में देरी कर सकते हैं। Bar & Bench में अधिवक्ता नरसिम्हन विजयराघवन ने लिखा कि आप के सांसदों का कदम दो-तिहाई की संख्या तो पूरी करता है, लेकिन कानून की शर्त नहीं। उनकी व्याख्या में पैराग्राफ 4 मूल राजनीतिक दल के विलय की बात करता है, और आप अब भी एक पार्टी के रूप में मौजूद है।

LiveLaw में ध्रुव उपाध्ये ने तेलंगाना मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अध्यक्षों की देरी ने इस कानून को कमज़ोर किया है। ये दोनों टिप्पणीकारों की राय हैं। 11 अक्टूबर 2026 तक हमें संसद के 2026 के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला नहीं मिला।

क्या दल-बदल कानून राज्य विधानसभाओं पर भी लागू होता है?

हां। दसवीं अनुसूची संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानमंडलों पर लागू होती है। अनुच्छेद 122 और 212 के तहत अयोग्यता की कार्यवाही को संसद या राज्य विधानमंडल की कार्यवाही माना जाता है। अगर सवाल खुद अध्यक्ष या सभापति से जुड़ा हो, तो सदन द्वारा चुना गया कोई सदस्य फैसला करता है।

मूल दस्तावेज़