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भारत में विधेयक कानून कैसे बनता है

मंत्री की मेज़ से कानून की किताब तक पहुंचने में विधेयक छह चरणों से गुज़रता है। हर चरण में क्या होता है, और धन विधेयक, संयुक्त बैठक और निजी सदस्य विधेयक इसमें कहां आते हैं।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

किसी विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित होना होता है, और फिर उस पर राष्ट्रपति की मंजूरी चाहिए। इस बीच उसे पेश किया जाता है, उसे समिति के पास भेजा जा सकता है, उस पर बहस होती है और खंड-दर-खंड मतदान होता है, और फिर दूसरे सदन में भी वह ऐसे ही चरणों से गुज़रता है।

संसद में विधेयक कौन पेश कर सकता है?

कोई भी सांसद विधेयक पेश कर सकता है, लेकिन ज़्यादातर कानूनों की शुरुआत किसी मंत्री से होती है। लोकसभा सचिवालय की संसद संबंधी गाइड के अनुसार, विधेयक “किसी मंत्री या किसी निजी सदस्य द्वारा पेश किया जा सकता है”। सरकारी विधेयक मंत्रालयों से आते हैं। जो सांसद मंत्री नहीं हैं, उनके विधेयकों को निजी सदस्य विधेयक कहा जाता है।

संविधान के अनुच्छेद 107 के तहत विधेयक किसी भी सदन में पेश हो सकता है। इसका अपवाद धन विधेयक और कुछ अन्य वित्तीय विधेयक हैं, जिन्हें सिर्फ लोकसभा में पेश किया जा सकता है।

विधेयक के कानून बनने के छह चरण कौन-से हैं?

विधेयक एक सदन में पेश होने, वैकल्पिक समिति चरण, विस्तृत विचार और अंतिम मतदान से गुज़रता है, फिर दूसरे सदन में यही चरण होते हैं, और आखिर में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलती है।

साधारण विधेयक का रास्ता

  1. चरण 1पेश होना (पहला वाचन): कोई मंत्री या निजी सदस्य किसी भी सदन में विधेयक पेश करता है।
  2. चरण 2समिति (वैकल्पिक): सदन इसे प्रवर समिति या संयुक्त समिति को भेज सकता है; पीठासीन अधिकारी इसे स्थायी समिति को भेज सकते हैं।
  3. चरण 3दूसरा वाचन: सामान्य चर्चा, फिर पेश किए गए या समिति द्वारा रिपोर्ट किए गए रूप में विधेयक पर खंड-दर-खंड विचार।
  4. चरण 4तीसरा वाचन: हर खंड पर मतदान के बाद सदन विधेयक पारित करने के लिए वोट करता है।
  5. चरण 5दूसरा सदन: विधेयक दूसरे सदन में भी ऐसे ही चरणों से गुज़रता है।
  6. चरण 6मंजूरी: दोनों सदनों से पारित विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है और मंजूरी मिलने पर अधिनियम बन जाता है।

लोकसभा सचिवालय के अनुसार, दूसरे वाचन के दो हिस्से होते हैं: सामान्य बहस, और फिर “पेश किए गए रूप में, या प्रवर/संयुक्त समिति द्वारा रिपोर्ट किए गए रूप में विधेयक पर खंड-दर-खंड विचार”।

विधेयक तभी कानून बनता है जब दोनों सदन उसे एक ही रूप में मंज़ूर करें (अनुच्छेद 107)। संविधान संशोधन के लिए इससे ज़्यादा चाहिए: उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। अप्रैल 2026 में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को लोकसभा में 298 वोट पक्ष में और 230 विरोध में मिले। यह बहुमत तो था, लेकिन ज़रूरी 352 वोटों से कम था, इसलिए विधेयक गिर गया (LiveLaw, 17 अप्रैल 2026)।

कितने विधेयक संसदीय समिति के पास भेजे जाते हैं?

पहले के मुकाबले कम। समिति से जांच वैकल्पिक है, और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार 15वीं लोकसभा के बाद से समितियों को भेजे जाने वाले विधेयकों का हिस्सा तेज़ी से घटा है।

संसदीय समितियों को भेजे गए विधेयकों का हिस्सालोकसभा के हिसाब से (%)। 18वीं लोकसभा मानसून सत्र 2026 तक। पीआरएस ने बाद के एक पेज पर 16वीं लोकसभा के लिए 28% बताया है।
संसदीय समितियों को भेजे गए विधेयकों का हिस्सा. लोकसभा के हिसाब से (%)। 18वीं लोकसभा मानसून सत्र 2026 तक। पीआरएस ने बाद के एक पेज पर 16वीं लोकसभा के लिए 28% बताया है।
मदमान
14वीं (2004-09)60%
15वीं (2009-14)71%
16वीं (2014-19)25%
17वीं (2019-24)16%
18वीं (2024-)21%

पीआरएस के अनुसार, 2026 के मानसून सत्र में लोकसभा ने जो 11 विधेयक पारित किए, उनमें से नौ पर मंत्री के अलावा किसी सांसद ने बात नहीं की।

जब दोनों सदनों में सहमति न बने तो क्या होता है?

राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकते हैं। अनुच्छेद 108 इसकी अनुमति देता है अगर एक सदन दूसरे सदन से पारित विधेयक को खारिज कर दे, अगर संशोधनों पर दोनों सदनों में अंतिम रूप से असहमति हो, या अगर दूसरा सदन छह महीने से ज़्यादा समय तक उसे पारित न करे। जिन दिनों वह सदन सत्रावसान में हो या लगातार चार दिन से ज़्यादा स्थगित रहे, वे दिन छह महीने में नहीं गिने जाते।

संयुक्त बैठक में विधेयक दोनों सदनों के उपस्थित और मतदान करने वाले कुल सदस्यों के बहुमत से पारित होता है। धन विधेयकों पर संयुक्त बैठक लागू नहीं होती।

धन विधेयक अलग क्यों होते हैं?

राज्यसभा धन विधेयक को न रोक सकती है, न उसमें संशोधन कर सकती है; वह सिर्फ बदलावों की सिफारिश कर सकती है, और वह भी 14 दिनों के भीतर। अनुच्छेद 110 धन विधेयक को ऐसा विधेयक बताता है जो सिर्फ करों, सरकारी उधार, संचित निधि या आकस्मिकता निधि, धन के विनियोग और उनसे जुड़े मामलों से संबंधित हो। कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, यह लोकसभा अध्यक्ष तय करते हैं, और उनका फैसला “अंतिम होगा”।

अनुच्छेद 109 के तहत धन विधेयक सिर्फ लोकसभा में पेश हो सकता है। लोकसभा राज्यसभा की सिफारिशें मान भी सकती है और ठुकरा भी सकती है। अगर राज्यसभा 14 दिनों के भीतर विधेयक नहीं लौटाती, तो उसे उसी रूप में दोनों सदनों से पारित माना जाता है जिसमें लोकसभा ने उसे पारित किया था।

राष्ट्रपति के पास क्या विकल्प होते हैं?

राष्ट्रपति मंजूरी दे सकते हैं, मंजूरी रोक सकते हैं, या विधेयक को एक बार पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं। अनुच्छेद 111 राष्ट्रपति को धन विधेयक के अलावा कोई भी विधेयक बदलावों का सुझाव देने वाले संदेश के साथ लौटाने की अनुमति देता है। अगर संसद उन बदलावों के साथ या उनके बिना उसे फिर से पारित कर दे, तो राष्ट्रपति “मंजूरी नहीं रोकेंगे”।

क्या निजी सदस्य विधेयक कभी कानून बनते हैं?

बहुत कम। पीआरएस के अनुसार, अब तक सिर्फ 14 निजी सदस्य विधेयक दोनों सदनों से पारित होकर मंजूरी पा सके हैं, और 1970 के बाद एक भी नहीं। 17वीं लोकसभा (2019-24) में सांसदों ने ऐसे 729 विधेयक पेश किए और सदन ने दो पर चर्चा की।

पीआरएस के रिकॉर्ड के अनुसार, 2026 के बजट सत्र और मानसून सत्र में लोकसभा ने निजी सदस्यों का कोई कामकाज नहीं लिया। बजट सत्र में राज्यसभा में 50 निजी सदस्य विधेयक पेश हुए।

लोकसभा भंग होने पर विधेयक का क्या होता है?

यह इस पर निर्भर करता है कि विधेयक कहां है। अनुच्छेद 107 के तहत, लोकसभा में लंबित विधेयक, या लोकसभा से पारित होकर राज्यसभा में लंबित विधेयक, लोकसभा भंग होने पर खत्म हो जाता है। राज्यसभा में लंबित जिस विधेयक को लोकसभा ने पारित नहीं किया है, वह बचा रहता है। सत्रावसान, यानी सत्र की औपचारिक समाप्ति, से लंबित विधेयक खत्म नहीं होता।

संसद में इस समय मौजूद हर विधेयक पर नज़र रखने के लिए हमारा संसद में विधेयक ट्रैकर देखें।

मूल दस्तावेज़