समझिएपरिसीमन
परिसीमन क्या है, और 131वां संविधान संशोधन विधेयक क्यों गिरा
राज्यों के बीच लोकसभा सीटें कैसे बंटती हैं, 1976 से ये संख्याएं क्यों रुकी हुई हैं, और अप्रैल 2026 में इन्हें बदलने की सरकार की कोशिश से क्या होता।
संक्षेप में
परिसीमन के ज़रिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा खींची जाती हैं और आबादी के आधार पर तय होता है कि हर राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी। राज्यों की कुल सीटें 2026 के बाद की पहली जनगणना तक 1971 की जनगणना पर रुकी हुई हैं। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, जो लोकसभा की अधिकतम सीमा 850 करता और 2011 की जनगणना पर परिसीमन की अनुमति देता, 17 अप्रैल 2026 को 298 के मुकाबले 230 वोट ही पा सका, जो ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत से कम था।
परिसीमन क्या है?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिससे तय होता है कि हर राज्य को लोकसभा और उसकी विधानसभा में कितनी सीटें मिलेंगी, और हर निर्वाचन क्षेत्र की सीमा कैसे खींची जाएगी। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के सारांश के अनुसार, संविधान का सिद्धांत यह है कि सीटें आबादी के अनुपात में बंटें, ताकि अलग-अलग राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग बराबर लोग हों। अनुच्छेद 81 और 82 हर जनगणना के बाद सीटों के पुनर्समायोजन की बात करते हैं, और अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं पर ऐसा ही नियम लागू करता है। यह काम परिसीमन आयोग करता है। पिछला आयोग 2002 में बना था और उसके आदेश 2008 में अंतिम रूप से लागू हुए।
राज्यों की लोकसभा सीटें 50 साल से क्यों नहीं बदलीं?
क्योंकि संविधान ने इन्हें 1971 की जनगणना पर रोक दिया, और 2001 में यह रोक आगे बढ़ा दी गई। 1976 के 42वें संशोधन ने हर राज्य की सीटों का हिस्सा 2000 के बाद की पहली जनगणना तक 1971 के आंकड़ों पर तय कर दिया। 2001 के 84वें संशोधन ने इसे “2026 के बाद प्रकाशित पहली जनगणना तक” बढ़ा दिया। पीआरएस के मुताबिक, इसका घोषित मकसद जनसंख्या स्थिरीकरण को बढ़ावा देना था, ताकि जिन राज्यों ने आबादी की बढ़त धीमी की, उनकी सीटें न घटें। 2000 के दशक में राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा खींची गईं, लेकिन हर राज्य की कुल सीटें वही रहीं।
131वें संविधान संशोधन विधेयक में क्या प्रस्ताव था?
यह लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करता, और संसद को कानून बनाकर यह तय करने देता कि परिसीमन कब हो और किस जनगणना के आधार पर हो। पीआरएस के अनुसार, इनमें से अधिकतम 815 सीटें राज्यों को और अधिकतम 35 केंद्र शासित प्रदेशों को मिलतीं। पीआरएस बताता है कि संसद ये फैसले साधारण बहुमत से कर सकती थी। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, साथ में लाया गया परिसीमन विधेयक एक आयोग बनाता, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) के मौजूदा या पूर्व न्यायाधीश करते, और जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके नामित व्यक्ति और राज्य चुनाव आयुक्त होते। यह आयोग 2011 की जनगणना के आधार पर सीटें दोबारा तय करता। केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक समेत तीनों विधेयक 16 अप्रैल 2026 को पेश किए गए।
इसका महिला आरक्षण से क्या संबंध था?
यह विधेयक नए परिसीमन के तुरंत बाद महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू होने का रास्ता खोलता। संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है, लेकिन यह अधिनियम के बाद हुई पहली जनगणना पर आधारित परिसीमन के बाद ही लागू होगा। LiveLaw के अनुसार, केंद्र ने 2023 के अधिनियम को 16 अप्रैल 2026 को अधिसूचित किया, लेकिन अधिनियम के तहत आरक्षण अब भी परिसीमन का इंतज़ार कर रहा है। पीआरएस बताता है कि मौजूदा जनगणना की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 है और उस पर आधारित परिसीमन 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पूरा होने की संभावना कम है।
131वां संशोधन विधेयक क्यों गिरा?
इसे सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का वह दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला जो संविधान संशोधन के लिए ज़रूरी है। 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में 298 वोट पक्ष में और 230 विरोध में पड़े। 528 सदस्यों के मतदान में 352 वोट चाहिए थे। South First ने लिखा कि यह “नरेंद्र मोदी सरकार के 12 वर्षों में लोकसभा में गिरने वाला पहला विधेयक” था। इसके बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश विधेयक वापस ले लिए।
LiveLaw के अनुसार, विपक्षी दलों का तर्क था कि 2011 की जनगणना पर सीटें दोबारा तय करने से दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों का हिस्सा घटेगा, और उन्होंने नई जनगणना जारी रहते हुए इसके समय पर सवाल उठाए। ज़्यादातर दलों ने कहा कि वे महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं।
परिसीमन से किन राज्यों की सीटें बढ़तीं और किनकी घटतीं?
पीआरएस के उदाहरण के मुताबिक, सदन का आकार मौजूदा स्तर पर रहने पर उत्तर प्रदेश और बिहार की सीटें बढ़तीं, जबकि तमिलनाडु और केरल की सीटें घटतीं।
पीआरएस ने यह भी बताया कि बड़ी लोकसभा से राज्यसभा के मुकाबले उसका अनुपात लगभग 2.2:1 से बढ़कर 3.3:1 हो जाता, जिसका असर संयुक्त बैठकों और राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ता है, और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के आकार की अधिकतम सीमा भी बढ़ जाती।
अब परिसीमन का क्या होगा?
अक्टूबर 2026 तक रोक कायम है: अगला पुनर्समायोजन 2026 के बाद प्रकाशित पहली जनगणना से जुड़ा है, यानी वही जनगणना जो अभी चल रही है। The Tribune ने 1 सितंबर को बताया था कि सरकार संशोधित विधेयक के लिए 18 से 20 सितंबर तक विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है, जिसमें शायद राज्यों की सीटों के हिस्से के लिए सुरक्षा उपाय हों। ऐसा कोई सत्र होने की खबर नहीं आई, और 11 अक्टूबर तक किसी संशोधित विधेयक की रिपोर्ट नहीं थी। Business Standard के अनुसार, मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ, लेकिन असामान्य रूप से उसका सत्रावसान नहीं किया गया, जिससे सरकार के पास संसद को दोबारा बुलाने का विकल्प खुला है।
परिसीमन के अहम पड़ाव
- 197642वें संशोधन ने राज्यों की कुल सीटें 2000 के बाद तक 1971 की जनगणना पर रोक दीं।
- 200184वें संशोधन ने यह रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ाई।
- 2002-2008पिछले परिसीमन आयोग ने राज्यों के भीतर सीमाएं दोबारा खींचीं।
- 2023106वें संशोधन ने अगले परिसीमन के बाद एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कीं।
- 16 अप्रैल 2026131वां संशोधन, परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेश विधेयक पेश हुए।
- 17 अप्रैल 2026लोकसभा में मतदान: 298 पक्ष में, 230 विरोध में; संशोधन गिरा, साथ के विधेयक वापस लिए गए।
- 1 मार्च 2027जनगणना 2027 के ज़्यादातर हिस्से की संदर्भ तिथि।
मूल दस्तावेज़
- The Constitution (131st Amendment) Bill, 2026PRS Legislative Research, 17 अप्रैल 2026
- The Delimitation Bill, 2026PRS Legislative Research, 11 अक्टूबर 2026