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संसदीय समितियां: जेपीसी, स्थायी समिति और प्रवर समिति में क्या फर्क है

संसद में विधेयकों की बारीक जांच का बड़ा हिस्सा बंद कमरे में बैठने वाली छोटी समितियों में होता है। ये एक-दूसरे से कैसे अलग हैं, और इस समय कौन-सी समितियां काम कर रही हैं।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

स्थायी समितियां हमेशा बनी रहती हैं और मंत्रालयों व सरकारी खर्च पर नज़र रखती हैं; प्रवर समिति और संयुक्त समिति किसी खास विधेयक की जांच के लिए बनती हैं और रिपोर्ट देने के बाद खत्म हो जाती हैं। प्रवर समिति में एक ही सदन के सदस्य होते हैं, संयुक्त संसदीय समिति में दोनों सदनों के। इनकी सिफारिशें संसद का मार्गदर्शन करती हैं, लेकिन संसद उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं है।

संसद को समितियों की ज़रूरत क्यों होती है?

क्योंकि पूरे सदन के पास न तो इतना समय होता है और न ही ऐसा माहौल कि वह हर विधेयक और खर्च के हर रुपये की बारीकी से जांच कर सके। समितियां सांसदों के छोटे समूह होती हैं, जो किसी विधेयक या मंत्रालय का अध्ययन करती हैं, गवाहों को सुनती हैं और सदन को रिपोर्ट देती हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, इनकी बैठकें “बंद कमरे के माहौल में होती हैं”।

संसद की स्थायी समितियां क्या होती हैं?

ऐसी स्थायी समितियां जो मंत्रालयों और सरकारी पैसे पर नज़र रखती हैं। इनमें सबसे जानी-मानी 1993 में बनी 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियां हैं। पीआरएस के अनुसार, हर समिति में 31 सदस्य होते हैं, 21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से, और इसका गठन एक साल के लिए होता है।

इनके अलावा वित्तीय समितियां भी हैं:

  • लोक लेखा समिति नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के ऑडिट निष्कर्षों की जांच करती है।
  • प्राक्कलन समिति में 30 सदस्य होते हैं, सभी लोकसभा से।
  • सार्वजनिक उपक्रम समिति सरकारी कंपनियों की जांच करती है, और इसमें लोकसभा के 15 और राज्यसभा के सात सदस्य होते हैं।

भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली वित्त संबंधी स्थायी समिति ने 23 जुलाई 2026 को प्रतिभूति बाज़ार संहिता, 2025 पर अपनी रिपोर्ट दी। यह संहिता प्रतिभूतियों से जुड़े तीन कानूनों को मिलाकर एक करती है।

संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) क्या होती है?

दोनों सदनों के सदस्यों की ऐसी समिति जो किसी खास काम, आमतौर पर किसी एक विधेयक, के लिए बनती है और रिपोर्ट देने के बाद खत्म हो जाती है। पीआरएस ऐसी समितियों को “तदर्थ” कहता है। लोकसभा सचिवालय के अनुसार, सदन किसी विधेयक को “सदन की प्रवर समिति या दोनों सदनों की संयुक्त समिति” को भेजने का फैसला कर सकता है।

काम कर रही संयुक्त और प्रवर समितियां (अक्टूबर 2026 तक)

  1. 19 दिसंबर 2024एक देश, एक चुनाव विधेयक पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली 41 सदस्यों की जेपीसी को भेजे गए। समय-सीमा अब शीतकालीन सत्र 2026 के आखिरी हफ्ते का पहला दिन।
  2. 20 अगस्त 2025हिरासत में लिए गए मंत्रियों को हटाने से जुड़ा संविधान (130वां संशोधन) विधेयक अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता वाली जेपीसी को भेजा गया। अभी रिपोर्ट नहीं आई।
  3. 16 दिसंबर 2025उच्च शिक्षा के लिए एकल नियामक से जुड़ा विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक दग्गुबाती पुरंदेश्वरी की अध्यक्षता वाली जेपीसी को भेजा गया। अभी रिपोर्ट नहीं आई।
  4. 3 अगस्त 2026सुधीर गुप्ता की अध्यक्षता वाली कंपनी कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पर बनी जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट पेश की।
  5. 12 अगस्त 2026एफसीआरए संशोधन विधेयक 31 सदस्यों वाली जेपीसी को भेजा गया। रिपोर्ट शीतकालीन सत्र 2026 के पहले हफ्ते में आनी है।

ThePrint के अनुसार, एफसीआरए समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य हैं। हमें मिली किसी भी रिपोर्ट में इसके सदस्यों के नाम नहीं बताए गए हैं।

प्रवर समिति जेपीसी से कैसे अलग है?

प्रवर समिति में सिर्फ एक ही सदन के सदस्य होते हैं। यह भी किसी खास विधेयक की जांच के लिए बनती है। पीआरएस के अनुसार, लोकसभा ने 12 अगस्त 2025 को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली प्रवर समिति को भेजा। समिति ने 17 दिसंबर 2025 को रिपोर्ट दी, और संसद ने मार्च और अप्रैल 2026 में विधेयक पारित किया।

कोई विधेयक संसदीय समिति के पास कैसे पहुंचता है?

या तो सदन उसे भेजने के लिए मतदान करता है, या लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति उसे भेजते हैं। प्रवर और संयुक्त समितियां तब बनती हैं जब सदन किसी विधेयक को भेजने का फैसला करता है। पीआरएस के अनुसार, स्थायी समितियों को विधेयक लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति भेजते हैं। एक सदन से पारित हो चुके विधेयक को भी दूसरा सदन समिति के पास भेज सकता है।

विधेयक को समिति के पास भेजना ज़रूरी नहीं है, और अब ऐसा कम होने लगा है। पीआरएस के अनुसार, 17वीं लोकसभा ने जिन 30 विधेयकों को समितियों के पास भेजा, उनमें से 24 स्थायी समितियों को, पांच संयुक्त समितियों को और एक प्रवर समिति को गया। मौजूदा 18वीं लोकसभा में अब तक 21% विधेयक समितियों को भेजे गए हैं, जबकि 17वीं में यह आंकड़ा 16% था।

17वीं लोकसभा ने जांच के लिए विधेयक कहां भेजेसमिति के प्रकार के हिसाब से भेजे गए विधेयकों की संख्या (2019-24)
17वीं लोकसभा ने जांच के लिए विधेयक कहां भेजे. समिति के प्रकार के हिसाब से भेजे गए विधेयकों की संख्या (2019-24)
मदमान
स्थायी समितियां24
संयुक्त समितियां5
प्रवर समिति1

18वीं लोकसभा का रुझान दूसरी तरफ रहा है। पीआरएस के अनुसार, 2025 के शीतकालीन सत्र तक इसने 42 में से 11 विधेयक समितियों को भेजे थे, और सिर्फ एक, प्रतिभूति बाज़ार संहिता, स्थायी समिति को भेजा था। 1 सितंबर 2026 को स्थायी समिति को भेजा गया भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026 ऐसा दूसरा विधेयक है।

क्या सरकार को समिति की सिफारिशें माननी पड़ती हैं?

नहीं। समिति की रिपोर्टें संसद को सलाह देती हैं; संसद उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं है। पीआरएस के 2019 के चर्चा पत्र के अनुसार, सदन के लिए समिति की सिफारिशों पर चर्चा करना या उन्हें ठुकराने की वजह बताना ज़रूरी नहीं है। पत्र में जिन आठ वर्षों का अध्ययन किया गया, उनमें सरकार ने लोक लेखा समिति की 80% और सार्वजनिक उपक्रम समिति की 67% सिफारिशें मानीं।

संसदीय समितियों में सुधार के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं?

पीआरएस ने सभी विधेयकों को समितियों के पास भेजने की वकालत की है, और ब्रिटेन का उदाहरण दिया है, जहां धन विधेयक को छोड़कर हर विधेयक अपने आप किसी समिति के पास जाता है। उसके 2019 के पत्र में समिति रिपोर्टों पर बहस अनिवार्य करने, समितियों को शोध कर्मचारी और विशेषज्ञ सलाहकार देने, और उपस्थिति सुधारने के सुझाव भी दिए गए। पत्र के अनुसार, समिति की बैठकों में उपस्थिति करीब 50% थी, जबकि संसद की बैठकों में यह 84% थी।

मूल दस्तावेज़