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रिजिजू का खड़गे को जवाब: परिसीमन पर बातचीत के लिए कांग्रेस ने कभी तारीख नहीं दी
सर्वदलीय बैठक की कांग्रेस अध्यक्ष की मांग पर संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सरकार सात दूसरे दलों से सलाह कर चुकी है, और कांग्रेस से आगे के विधेयकों में अड़ंगा न डालने को कहा।

मुख्य बातें
- किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार ने मल्लिकार्जुन खड़गे को 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल को पत्र लिखे थे।
- सरकार के मुताबिक उसने डीएमके, सपा, वाईएसआरसीपी, एनसीपी, शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजेडी से सलाह की।
- रिजिजू ने खड़गे की इस आपत्ति को खारिज किया कि संसद का 13 अगस्त से सत्रावसान नहीं हुआ है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक की कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की मांग का जवाब देते हुए कहा कि सरकार ने कांग्रेस से बार-बार संपर्क किया और जवाब न मिलने पर ही दूसरे दलों से बात की।
खड़गे को लिखे पत्र में रिजिजू ने कहा कि सरकार ने “मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस से कई मौकों पर संपर्क किया”। उन्होंने खड़गे को 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल को लिखे पत्रों और निजी बातचीत का जिक्र किया, और बताया कि मानसून सत्र के दौरान वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से भी मिले थे।
रिजिजू ने लिखा, “बार-बार अनुरोध के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने बातचीत के लिए तारीख नहीं दी।” उन्होंने कहा, “डीएमके, सपा, वाईएसआरसीपी, एनसीपी, शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजेडी समेत दलों के प्रतिनिधियों से सलाह-मशविरा किया गया।”
मोदी को लिखे खड़गे के पत्र का जवाब
यह पत्र खड़गे के उस पत्र का जवाब है जो उन्होंने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा था। उसमें उन्होंने मांग की थी कि परिसीमन से जुड़ा कोई भी संशोधन दोबारा संसद में लाने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। खड़गे इस साल कई बार इस विषय पर प्रधानमंत्री को लिख चुके हैं। अगस्त में उन्होंने विशेष सत्र के जरिए विधेयक पारित कराने के खिलाफ चेताया था।
रिजिजू ने सवाल किया कि यह मांग बार-बार क्यों उठ रही है। उन्होंने लिखा, “यह स्पष्ट नहीं है कि सलाह-मशविरे की मांग बार-बार क्यों की जा रही है।” साथ ही जोड़ा, “हम राष्ट्रीय महत्व के सभी मामलों पर विचार-विमर्श में सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी को महत्व देते हैं।”
पत्र के आखिर में उन्होंने लिखा, “मुझे उम्मीद है कि कांग्रेस पार्टी रचनात्मक भूमिका निभाएगी और भविष्य के महत्वपूर्ण विधेयकों में बाधा नहीं डालेगी।”
सत्रावसान पर बहस
खड़गे ने यह आपत्ति भी जताई थी कि 13 अगस्त को सदन के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के दो महीने से ज्यादा बाद भी संसद का सत्रावसान नहीं हुआ है। जिस सदन का सत्रावसान न हुआ हो, उसे कम समय के नोटिस पर फिर बुलाया जा सकता है, और इसी से विशेष सत्र की अटकलें तेज हुई हैं।
रिजिजू ने कहा कि सत्रावसान के लिए “कोई तय अवधि बताने वाली संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है”। उन्होंने उन वर्षों का हवाला दिया जब सदन लंबे समय तक बिना सत्रावसान के रहे, जैसे 1987 में 76 दिन और 1989 में 54 दिन। उन्होंने बताया कि 2008 में लोकसभा 21 और 22 जुलाई को बैठी, फिर 17 अक्टूबर को और फिर 10 दिसंबर को, और बीच में सत्रावसान नहीं हुआ।
सरकार ने किसी सत्र की घोषणा नहीं की है।
आंकड़े क्यों अहम हैं
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, जिससे महिला आरक्षण लागू करने के लिए लोकसभा को 850 सीटों तक बढ़ाया जाना था, 16 अप्रैल को पेश हुआ और अगले दिन गिर गया। संविधान संशोधन पर यह मोदी सरकार की पहली हार थी। ऐसे संशोधन के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।
रिजिजू ने जिन दलों के नाम लिए, उनमें से कई ने हाल के दिनों में चुनाव आयोग की तीखी आलोचना की है। रविवार को वाईएसआरसीपी प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले 2023 के कानून का समर्थन करना उनकी पार्टी की गलती थी। उन्होंने कहा, “हमें वह गलती करने का अफसोस है।” इंडिया गठबंधन से अलग हो चुकी डीएमके ने शनिवार को मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की और कहा कि वह “सिर्फ इसलिए भाजपा के साथ नहीं जाएगी कि हम इंडिया गठबंधन से बाहर आ गए”।
मंगलवार सुबह तक कांग्रेस ने रिजिजू के पत्र का जवाब नहीं दिया था।