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फसल के ऊपर सोलर पैनल: दिल्ली में विश्व सम्मेलन खत्म, देश में अभी 36 एग्रीवोल्टिक परियोजनाएं

सरकार का कहना है कि सोलर पैनलों के साथ साझा की गई खेती की ज़मीन आमदनी बढ़ा सकती है और गर्मी का दबाव घटा सकती है, लेकिन हज़ारों गीगावाट की अनुमानित क्षमता के मुकाबले लगी हुई क्षमता अभी 40 मेगावाट से भी कम है।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
एग्रीवोल्टिक संयंत्र में फसल के खेत के ऊपर लगे सोलर पैनल (फ़ाइल फ़ोटो)
एग्रीवोल्टिक संयंत्र में फसल के खेत के ऊपर लगे सोलर पैनल (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Tobi Kellner / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. अगस्त 2025 तक देश में 37.54 मेगावाट क्षमता की 36 एग्रीवोल्टिक परियोजनाएं चालू थीं।
  2. देश की अनुमानित क्षमता करीब 3,000 से 14,000 गीगावाट है।
  3. महाराष्ट्र और राजस्थान समेत छह राज्यों में करीब आधी क्षमता है।

देश में ऐसे सिर्फ 36 चालू खेत हैं जहां सोलर पैनल और फसलें एक ही ज़मीन साझा करते हैं। सरकार ने शुक्रवार को यह जानकारी दी, जब नई दिल्ली में “पावरिंग द ग्लोबल साउथ” थीम के साथ 7वां एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन खत्म हुआ।

सम्मेलन के आखिरी दिन जारी एक पृष्ठभूमि नोट में सरकार ने बताया कि अगस्त 2025 तक इन 36 परियोजनाओं की कुल क्षमता 37.54 मेगावाट थी और 10 और पायलट परियोजनाएं तैयार हो रही थीं। इसके मुकाबले देश की अनुमानित क्षमता करीब 3,000 से 14,000 गीगावाट आंकी गई है।

विचार सीधा है। सोलर पैनल इतने ऊंचे ढांचों पर लगाए जाते हैं कि नीचे से ट्रैक्टर निकल सके, और नीचे की फसलों को आंशिक छाया मिलती है। यह छाया गर्मी के दबाव को कम कर सकती है और भाप बनकर उड़ने वाले पानी को घटा सकती है। ज़मीन का इस्तेमाल पशुपालन के लिए भी हो सकता है और बची हुई बिजली ग्रिड को बेची जा सकती है। सरकार के मुताबिक कुछ मामलों में किसान की सालाना कमाई करीब ₹60,000 प्रति एकड़ से बढ़कर ₹1 लाख से ज़्यादा हो सकती है। फल, सब्ज़ियां, मसाले और औषधीय पौधे इसके लिए सबसे उपयुक्त माने गए हैं।

क्षमता कहां है

महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश, ये छह राज्य मिलकर बिजली उत्पादन की करीब आधी क्षमता रखते हैं। मैपिंग टूल से की गई जांच में 47.35 मिलियन हेक्टेयर “प्रतिबंधित कृषि भूमि” पैनलों के लिए उपयुक्त पाई गई।

कई राज्य पहले से इसी दिशा में योजनाएं चला रहे हैं। महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना 2.0 का लक्ष्य करीब 35,000 एकड़ पर 16,000 मेगावाट सौर बिजली बनाकर कृषि उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है, और कर्नाटक की सूर्य रैता योजना किसानों को सोलर पंप से बची बिजली बेचने देती है। राष्ट्रीय स्तर पर 2019 में शुरू हुई पीएम-कुसुम योजना में खेती में सौर ऊर्जा के लिए करीब ₹34,422 करोड़ की केंद्रीय सहायता है।

शोध का नेतृत्व राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान और आईसीएआर-आईएआरआई का बनाया एग्रीवोल्टिक्स सेंटर ऑफ एक्सीलेंस कर रहा है, जहां दिल्ली में 100 किलोवाट की परीक्षण प्रणाली लगी है। सौर उद्योग महासंघ की 2023 में शुरू की गई इंडिया एग्रीवोल्टिक्स एलायंस के अब 40 से ज़्यादा सदस्य हैं।

मूल दस्तावेज़