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सेहत के पैमाने पर भारत की जलवायु योजना को 32 में से 2 अंक, 132 देशों की सूची में सबसे नीचे
ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलायंस के मुताबिक भारत के नए जलवायु संकल्प में सेहत और वायु प्रदूषण का लगभग ज़िक्र नहीं है, जबकि देश में ज़हरीली हवा से हर साल करीब 20 लाख मौतें जुड़ी हैं।

मुख्य बातें
- हेल्दी एनडीसी स्कोरकार्ड में भारत को 32 में से 2 अंक मिले, जापान और न्यूज़ीलैंड के साथ सबसे नीचे।
- स्कोरकार्ड के अनुसार भारत के अप्रैल वाले जलवायु संकल्प को सेहत के आठ में से छह पैमानों पर शून्य मिला।
- कोलंबिया 29 अंकों के साथ शीर्ष पर रहा; बड़े उत्सर्जकों में सिर्फ ईयू ने वायु प्रदूषण का लक्ष्य तय किया।
लोगों की सेहत की हिफ़ाज़त के पैमाने पर भारत के ताज़ा जलवायु संकल्प को 32 में से सिर्फ 2 अंक मिले हैं। 132 देशों के एक वैश्विक स्कोरकार्ड में भारत जापान और न्यूज़ीलैंड के साथ सबसे निचले पायदान पर है।
हेल्दी एनडीसी स्कोरकार्ड ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलायंस ने जारी किया है, जो 300 से ज़्यादा स्वास्थ्य पेशेवरों, नागरिक संगठनों और नेटवर्क का समूह है। यह देखता है कि देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी), यानी पेरिस समझौते के तहत दाखिल जलवायु योजनाओं, में सेहत को कितनी जगह देते हैं। 2021 और 2023 के बाद यह इसका तीसरा संस्करण है।
भारत के अंक कहां कटे
स्कोरकार्ड में आठ पैमाने हैं और हर एक पर अधिकतम चार अंक। भारत को छह पैमानों पर शून्य मिला, जबकि स्वास्थ्य क्षेत्र की कार्रवाई और एकीकृत शासन पर एक-एक अंक।
अलायंस का कहना है कि भारत ने अप्रैल में जो एनडीसी दाखिल किया, उसमें सेहत का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया और उत्सर्जन के लक्ष्य पेरिस समझौते के अनुरूप नहीं हैं। उसके अनुमान के मुताबिक भारत में हर एक लाख लोगों पर 186.2 मौतें वायु प्रदूषण से होती हैं और देश औद्योगिक युग से पहले के मुकाबले 2°C से ज़्यादा तापमान बढ़ोतरी की राह पर है। 1995 से 2024 के आंकड़ों पर आधारित क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 में भारत नौवें स्थान पर था।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिसर्च और एडवोकेसी की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी ने कहा, “यह समझ से परे है कि जब भारत में वायु प्रदूषण से हर साल लगभग 20 लाख जानें जाती हैं...” उनका तर्क है कि संकल्प में वायु प्रदूषण और ब्लैक कार्बन जैसे अल्पकालिक प्रदूषकों की अनदेखी हुई है, जबकि भारत ने कॉप28 के जलवायु और स्वास्थ्य घोषणापत्र का समर्थन किया था।
फ्लेम यूनिवर्सिटी में सार्वजनिक नीति के प्रोफेसर और आईपीसीसी रिपोर्टों के लेखक अंजल प्रकाश ने कहा कि जलवायु नीति को “जन स्वास्थ्य से अलग नहीं किया जा सकता”। वे चाहते हैं कि भारत के अगले एनडीसी में सेहत के संकेतक हों, कमज़ोर तबकों पर असर का आकलन हो, स्वास्थ्य ढांचा मज़बूत किया जाए और बिगड़ती हवा से निपटा जाए।
बाकी देशों का हाल
कोलंबिया 29 अंकों के साथ सबसे ऊपर रहा। उसके बाद नाइजीरिया 25, कंबोडिया 24 और पैराग्वे व तिमोर-लेस्ते 22-22 अंकों पर रहे। यूएई को 19, कनाडा को 16, तुर्की को 14, दक्षिण अफ्रीका को 13, यूरोपीय संघ को 12 और इंडोनेशिया को 11 अंक मिले। ऑस्ट्रेलिया, चीन और ब्रिटेन 9-9 अंकों पर रहे, ब्राज़ील 7, रूस 6 और दक्षिण कोरिया 4 पर। अमेरिका को 7 अंक दिए गए, पर पेरिस समझौते से हटने के बाद उसकी योजना को सक्रिय नहीं माना गया है।
बड़े उत्सर्जकों में सिर्फ यूरोपीय संघ ने वायु प्रदूषण घटाने का ठोस लक्ष्य रखा है और 2050 तक एचएफसी खत्म करने का वादा किया है। सिर्फ पांच देशों, कंबोडिया, चिली, कोलंबिया, कोस्टा रिका और पैराग्वे, ने ब्लैक कार्बन घटाने के लक्ष्य तय किए हैं।
अध्ययन का नेतृत्व करने वाली अलायंस की पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता नोवा टेबे ने कहा कि अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों पर लगाम “तिहरा फ़ायदा देती है”। उन्होंने चेताया कि अल नीनो की स्थितियां सेहत पर असर और बढ़ा सकती हैं। अलायंस की कार्यकारी निदेशक जेनी मिलर ने कहा कि सरकारों को हवा की गुणवत्ता सुधारने को जलवायु कार्रवाई का अहम हिस्सा मानना होगा। नीति प्रमुख जेस बीगली ने कहा कि विकासशील देशों को अपनी योजनाएं लागू करने के लिए अमीर देशों से वित्तीय मदद चाहिए।
आगे क्या
नवंबर में तुर्की के अंताल्या में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप31 के एजेंडे में सेहत के रहने की उम्मीद है। स्कोरकार्ड तैयार करने वाले चाहते हैं कि भारत अगली बार संकल्प में बदलाव करते समय अपनी जलवायु और स्वच्छ हवा की नीतियों को जोड़े।