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पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अब भी ईशनिंदा के दुरुपयोग और जबरन धर्मांतरण के शिकार: एचआरसीपी

मानवाधिकार आयोग की धार्मिक स्वतंत्रता पर सालाना रिपोर्ट कहती है कि नए कानूनों से न अहमदियों पर हमले रुके, न हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण, और अल्पसंख्यक आयोग अब तक नहीं बना।

संपादकीय डेस्क से · लाहौरप्रकाशित
एचआरसीपी अध्यक्ष हिना जिलानी (फ़ाइल फ़ोटो)
एचआरसीपी अध्यक्ष हिना जिलानी (फ़ाइल फ़ोटो)Women Deliver / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. एचआरसीपी की सातवीं सालाना रिपोर्ट, सैंक्चुअरी डिनाइड, गुरुवार को लाहौर में जारी हुई।
  2. रिपोर्ट के मुताबिक हिंदू और ईसाई लड़कियां अब भी अपहरण और जबरन शादी झेल रही हैं।
  3. कानून पास होने के महीनों बाद भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन नहीं हुआ।

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने गुरुवार को कहा कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए हाल में बने कानूनों के बावजूद देश के धार्मिक अल्पसंख्यक ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग, जबरन शादी और धर्मांतरण, नफ़रती भाषणों और भेदभाव का सामना कर रहे हैं।

धार्मिक स्वतंत्रता पर आयोग की सातवीं सालाना रिपोर्ट, “सैंक्चुअरी डिनाइड”, लाहौर में जारी की गई। इसमें कहा गया है कि ईशनिंदा के आरोपी बहुत से लोग कानूनी अधर में लटके हैं, और एक “संगठित फंसाने वाले नेटवर्क” के कथित सदस्यों की जांच तक नहीं हुई।

रिपोर्ट में अक्टूबर 2025 और जून 2026 में चेनाब नगर में अहमदिया समुदाय पर हुए हमलों और अहमदियों को सार्वजनिक व कारोबारी जीवन से बाहर करने की बढ़ती कोशिशों का ब्योरा है। इसके मुताबिक ईसाई और हिंदू लड़कियों का अपहरण और जबरन शादी जारी है, और गरीबी व पुलिस की ढीली कार्रवाई इस समस्या को और बढ़ाती है।

अल्पसंख्यक अधिकार कार्यकर्ता नबीला फ़िरोज़ भट्टी ने शेखूपुरा के ईसाई चिकित्सक कामरान गिल के मामले का ज़िक्र किया, जिनकी डिस्पेंसरी को 9 अक्टूबर को एक भीड़ ने आग लगा दी थी। उन पर सोशल मीडिया पर ईशनिंदा वाली सामग्री साझा करने का आरोप लगाया गया था।

कानून, जिस पर अमल बाकी

एचआरसीपी ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 2025 और पंजाब व बलूचिस्तान में शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल तय करने वाले कानूनों का स्वागत किया, लेकिन कहा कि अल्पसंख्यक आयोग अब तक नहीं बना है। उसने संघीय सरकार से बिना देरी इसका गठन करने और खैबर पख्तूनख्वा से भी शादी की वही उम्र तय करने वाला कानून बनाने को कहा।

एचआरसीपी की निदेशक फ़राह ज़िया ने चेताया कि अल्पसंख्यकों के प्रति राज्य का रवैया लगातार बहिष्कार वाला होता जा रहा है। आयोग के पंजाब के उपाध्यक्ष राजा अशरफ़ ने कहा कि ईशनिंदा के आरोप “कमज़ोर लोगों के शोषण और उन्हें खतरे में डालने का ज़रिया” बन गए हैं।

पूर्व अध्यक्ष हिना जिलानी ने कहा कि भेदभाव संस्थाओं में रचा-बसा है। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में ‘अल्पसंख्यक’ और ‘बहुसंख्यक’ की कोई अवधारणा नहीं होनी चाहिए।”

अपनी सिफ़ारिशों में रिपोर्ट कहती है कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बिना किसी इबादतगाह को न गिराया जाए, धर्मांतरण अदालत या किसी सरकारी अधिकारी के सामने हो, और ईशनिंदा की जांच वरिष्ठ अधिकारी करें।