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अमेरिका से दूसरे देशों के निर्वासितों की पहली उड़ान जमैका पहुंची
जून में हुए समझौते के तहत 22 लोग किंग्स्टन उतरे। सरकार का कहना है कि वह यह समझौता सार्वजनिक नहीं कर सकती, विपक्ष इस पर खुली बहस चाहता है।

मुख्य बातें
- अमेरिका से 22 निर्वासितों को लेकर एक उड़ान मंगलवार को नॉर्मन मैनली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरी।
- जमैका उन्हें उनके देश या कहीं और भेजेगा और आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को नहीं लेगा।
- विदेश मंत्री कामिना जॉनसन स्मिथ ने कहा कि अमेरिका समझौता सार्वजनिक करने पर राज़ी नहीं है।
अमेरिका से तीसरे देशों के निर्वासितों की पहली उड़ान मंगलवार को जमैका पहुंची। किंग्स्टन के नॉर्मन मैनली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 22 लोग उतरे। बताया गया कि उन्हें एक बस में बैठाकर किसी अज्ञात जगह ले जाया गया।
जमैका ने जून में वॉशिंगटन के साथ एक सहमति ज्ञापन पर दस्तखत किए थे, जिसके तहत वह ऐसे निर्वासितों को लेगा जो जमैका के नागरिक नहीं हैं। योजना के मुताबिक वह उन्हें उनके अपने देश या किसी और जगह भेजेगा। सरकार का कहना है कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले किसी व्यक्ति को नहीं लिया जाएगा और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) उनकी देखभाल में मदद करेगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा और शांति मंत्रालय तथा विदेश और विदेश व्यापार मंत्रालय के संयुक्त बयान में इसे “ट्रांज़िट व्यवस्था” बताया गया और कहा गया कि जमैका इसका खर्च नहीं उठाएगा।
समझौता जो किसी ने नहीं देखा
समझौते का पाठ जारी नहीं किया गया है। विदेश मंत्री कामिना जॉनसन स्मिथ ने कहा कि इससे जुड़े सवालों के “सभी जवाब दिए जा चुके हैं”। उन्होंने लिखा, “कुछ देशों के समझौते सार्वजनिक किए गए हैं, लेकिन हमारा साझेदार इस समझौते को सार्वजनिक करने पर राज़ी नहीं है।”
राष्ट्रीय सुरक्षा पर विपक्ष के प्रवक्ता फिट्ज़ जैक्सन ने कहा कि जमैका के लोगों से “उनकी सुरक्षा से जुड़े एक गुप्त दस्तावेज़ पर भरोसा करने को कहा जा रहा है”। उन्होंने पूछा कि इस समझौते पर खुली बहस क्यों नहीं हुई।
थर्ड कंट्री डिपोर्टेशन वॉच के मुताबिक कम से कम 35 देशों ने अमेरिका के साथ ऐसे समझौते किए हैं। यह परियोजना रिफ्यूजीज़ इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स फर्स्ट से जुड़ी है। बताया गया है कि ट्रंप प्रशासन ने ऐसे निर्वासनों के लिए करीब 41 करोड़ डॉलर अलग रखे हैं।
मानवाधिकार संगठनों ने इन निर्वासनों की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हैं और अमेरिका में इन्हें अदालतों में चुनौती दी जा रही है। आलोचकों का कहना है कि निर्वासितों को लेने वाले कुछ देश, जैसे दक्षिण सूडान, युद्ध से जूझ रहे हैं या उन पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप हैं। उनका यह भी कहना है कि इस तरीके से उन अदालती आदेशों से बचा जा सकता है, जो लोगों को किसी खास देश भेजे जाने से बचाते हैं।