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अफ़ग़ान सीमा पर कारोबार बंद हुए एक साल, पेशावर के निर्यातक गिन रहे घाटा
अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया पर निर्भर दवा कंपनियों और खाद्य कारोबारियों का ज़्यादातर धंधा चौपट हो गया है। ईरान होकर जाने वाला रास्ता छह हफ्ते लेता है और कई गुना महंगा है।

मुख्य बातें
- भीषण सीमा झड़पों के बाद पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच व्यापार अक्टूबर 2025 से बंद है।
- पेशावर के एक निर्यातक की आमदनी में अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया का हिस्सा 80 से घटकर 5 फीसदी रह गया।
- ईरान होकर उज़्बेकिस्तान माल भेजने में अब 10,000 से 13,000 डॉलर लगते हैं, तोरख़म से 2,000 से 3,000 डॉलर लगते थे।
पेशावर के पश्चिमी छोर पर हयाताबाद में फ़ेड्रो फ़ार्मास्युटिकल्स की फैक्ट्री में मशीनें अब भी चल रही हैं। बदला है तो बस यह कि दवाएं कहां जाती हैं। यहां पैक होने वाले माल का करीब 70 फीसदी अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के लिए होता था, लेकिन अक्टूबर 2025 में सीमा पर भीषण झड़पों के बाद पाकिस्तान ने अपने पश्चिमी पड़ोसी के साथ व्यापार रोक दिया।
एक साल बाद भी सीमा चौकियां खुलने के आसार नहीं हैं, और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के निर्यातक कहते हैं कि इस बंदी ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया है।
फ़ेड्रो के मुख्य कार्यकारी जुनैद अल्ताफ़ ने कहा, “जब सीमा बंद हुई तब हमारे पास ऑर्डर थे। कुछ माल तैयार था और कुछ बन रहा था।” उन्होंने कहा, “(कुछ) पैकेजिंग फ़ारसी में थी, अफ़ग़ान भाषा में। रूस और उज़्बेकिस्तान के लिए पैकेजिंग रूसी में थी। वह सारी पैकेजिंग फेंकनी पड़ी।”
यह फैक्ट्री तोरख़म से करीब 60 किलोमीटर दूर है। तोरख़म अफ़ग़ानिस्तान के नंगरहार प्रांत में जाने का मुख्य रास्ता है और मध्य एशिया जाने वाले माल का प्रवेश द्वार भी। पाकिस्तान के दवा उद्योग के लिए अफ़ग़ानिस्तान सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है।
80 से 5 फीसदी पर
खाद्य और कृषि निर्यातकों पर भी उतनी ही मार पड़ी है। चावल, मांस, खट्टे फल और आलू बेचने वाली एमएम इलाही ट्रेडर्स के मुख्य कार्यकारी मंज़ूर इलाही ने बताया कि कभी उनकी कंपनी की 80 फीसदी आमदनी अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया से आती थी। आज यह 5 फीसदी है।
उन्होंने कहा, “यह सिर्फ मेरे लिए नहीं, अफ़ग़ानिस्तान और उज़्बेकिस्तान के कारोबार से जुड़े हर किसी के लिए झटका था, पेशावर के समुदाय, मज़दूरों, कस्टम क्लियरेंस एजेंटों के लिए।”
हयाताबाद का एक ट्रक डिपो, जहां रोज़ 40 से 50 ट्रक अफ़ग़ानिस्तान के लिए निकलते थे, अब सूना पड़ा है। जो कारोबारी अब भी मध्य एशिया तक पहुंचना चाहते हैं, वे ईरान का रास्ता ले रहे हैं। यह रास्ता असुरक्षित बलूचिस्तान से होकर गुज़रता है और करीब छह हफ्ते लेता है।
निर्यातक मुहम्मद नईम ने कहा, “पहले तोरख़म सीमा से माल एक हफ्ते में उज़्बेकिस्तान पहुंच जाता था और 2,000 से 3,000 डॉलर का शुल्क लगता था। अब ईरान होकर भेजने में करीब 10,000 से 13,000 डॉलर लगते हैं।” उन्होंने कहा, “अगर कोई चीज़ एक्सपायर हो गई या खराब हो गई तो उसे फेंकना ही इकलौता रास्ता है।”
व्यापार पर सियासत भारी
इस्लामाबाद का कहना है कि जब तक अफ़ग़ानिस्तान का तालिबान प्रशासन उन चरमपंथियों पर कार्रवाई नहीं करता, जिन पर वह अफ़ग़ान ज़मीन से पाकिस्तान पर हमले का आरोप लगाता है, तब तक व्यापार शुरू नहीं होगा। काबुल इन आरोपों से इनकार करता है।
कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह नीति निशाने से ज़्यादा खुद पाकिस्तान को चोट पहुंचा रही है, क्योंकि देश का व्यापार घाटा बढ़ रहा है। पार्टनरशिप फ़ॉर इकोनॉमिक पॉलिसी के रिसर्च निदेशक वक़ार अहमद ने भारत और चीन की मिसाल दी, जो लंबे राजनीतिक और सैन्य तनाव के बावजूद आपस में व्यापार करते हैं। उन्होंने चेताया कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का कार्यक्रम पटरी पर रखने के लिए पाकिस्तान को ज़्यादा निर्यात कमाई चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर इस कार्यक्रम को सफल होना है तो पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाना होगा।”
कारोबारी संगठनों ने इस्लामाबाद और काबुल से बातचीत के ज़रिए मतभेद सुलझाने की अपील की है। फिलहाल तोरख़म पर ट्रक खड़े हैं।