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अमेरिका ने टीसीएस, इंफोसिस समेत आठ कंपनियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया रोकी, वेंस की टिप्पणी पर विदेश मंत्रालय की आपत्ति

अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ कंपनियों के नए और लंबित पर्म आवेदनों पर रोक लगा दी है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के विदेशी कामगारों को 'गिरमिटिया नौकर' कहने पर भारत ने आपत्ति जताई।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
वॉशिंगटन में अमेरिकी श्रम विभाग की फ्रांसेस पर्किन्स बिल्डिंग
वॉशिंगटन में अमेरिकी श्रम विभाग की फ्रांसेस पर्किन्स बिल्डिंगUS Department of Labor / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. अमेरिकी श्रम विभाग ने 8 अक्टूबर को कहा कि वह टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल समेत आठ कंपनियों से जुड़े पर्म श्रम प्रमाणन न तो स्वीकार करेगा और न ही उन पर कार्रवाई करेगा।
  2. रोज़गार आधारित ज़्यादातर ग्रीन कार्ड के लिए पर्म ज़रूरी है; रॉयटर्स के मुताबिक, यह रोक मौजूदा एच-1बी धारकों पर सीधे असर डालती नहीं दिखती।
  3. विदेश मंत्रालय ने 9 अक्टूबर को कहा कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की 'गिरमिटिया नौकर' वाली टिप्पणी अनुचित और बेहद आपत्तिजनक है।
  4. टीसीएस ने कहा कि पिछले दो साल में उसके पर्म आवेदन इकाई अंकों में थे और उसे अमेरिका में अपने कर्मचारियों से जुड़ी योजनाओं पर असर की उम्मीद नहीं है।

अमेरिकी श्रम विभाग ने 8 अक्टूबर को कहा कि वह आठ कंपनियों की ओर से स्पॉन्सर किए गए ग्रीन कार्ड के लिए श्रम प्रमाणन पर कार्रवाई बंद कर देगा। इनमें भारत की चार बड़ी आईटी कंपनियां शामिल हैं। अगले दिन भारत के विदेश मंत्रालय ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने अमेरिकियों की जगह रखे गए विदेशी कामगारों को “विदेशी गिरमिटिया नौकर” कहा था।

रॉयटर्स और गल्फ न्यूज़ के मुताबिक, ये कंपनियां टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज़, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी हैं।

अमेरिका ने क्या किया

रॉयटर्स के मुताबिक, श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने कहा कि विभाग “इन कंपनियों से जुड़े किसी भी नए स्थायी श्रम प्रमाणन आवेदन को स्वीकार नहीं करेगा और किसी भी लंबित आवेदन पर कार्रवाई नहीं करेगा”। यह कदम पर्म (PERM) पर लक्षित है, यानी वह श्रम प्रमाणन जो रोज़गार आधारित ज़्यादातर ग्रीन कार्ड के लिए ज़रूरी होता है। इसके तहत नियोक्ता को दिखाना होता है कि किसी विदेशी कामगार को रखने से अमेरिकी कामगारों के वेतन, कामकाज की स्थितियों या नौकरी की संभावनाओं को नुकसान नहीं होगा।

दिप्रिंट के मुताबिक, प्रशासन ने भर्ती में धोखाधड़ी वाले तौर-तरीकों का हवाला दिया। सोंडरलिंग ने कहा कि इन कंपनियों को 2009 से अब तक करीब 230,000 एच-1बी वीज़ा और 100,000 से ज़्यादा पर्म प्रमाणन मिले हैं। सरकार ने यह नहीं बताया है कि यह रोक कब तक रहेगी या इससे कितने कामगार प्रभावित होंगे।

रॉयटर्स के मुताबिक, यह रोक मौजूदा एच-1बी वीज़ा धारकों पर सीधे असर डालती नहीं दिखती। हालांकि, इससे वह आम रास्ता बंद हो सकता है जिसके ज़रिए नियोक्ता इन कामगारों को स्थायी निवास के लिए स्पॉन्सर करते हैं।

पर्म पर रोक, आंकड़ों में

  • 8कंपनियों पर रोक, जिनमें टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल शामिल
  • 230,0002009 से इन कंपनियों को मिले एच-1बी वीज़ा, अमेरिकी श्रम मंत्री के मुताबिक
  • 15,000अगले पांच साल में अमेरिका में टीसीएस की अतिरिक्त भर्तियों की योजना
  • 2%9 अक्टूबर को निफ्टी आईटी सूचकांक में बढ़त

वेंस की टिप्पणी

रॉयटर्स के मुताबिक, 8 अक्टूबर को व्हाइट हाउस की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वेंस ने खास तौर पर माइक्रोसॉफ्ट का नाम लिया। उन्होंने कहा, “आप एक महान अमेरिकी कंपनी हैं, लेकिन आपको महान अमेरिकी कामगारों को नौकरी देनी होगी।” रॉयटर्स और एपी के हवाले से गल्फ न्यूज़ के मुताबिक, उन्होंने आरोप लगाया कि माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी कामगारों की छंटनी की, जबकि उसी दौरान 6,300 एच-1बी वीज़ा और करीब 3,000 ग्रीन कार्ड हासिल किए। बिज़नेस टुडे के मुताबिक, उन्होंने यह दावा भी किया कि आउटसोर्सिंग कंपनियों की ओर से लाए गए एच-1बी कामगार अमेरिकी नागरिकों से 48,000 डॉलर कम कमाते हैं। ये वेंस के आरोप हैं, किसी जांच के निष्कर्ष नहीं।

रॉयटर्स के मुताबिक, वेंस ने कहा कि हार्वर्ड, येल और स्टैनफर्ड समेत नौ विश्वविद्यालयों की जांच होगी, जिसे प्रशासन ने “एक्सचेंज-विज़िटर वीज़ा का दुरुपयोग” बताया।

भारत की प्रतिक्रिया

दिप्रिंट के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने 9 अक्टूबर को एक बयान में कहा कि अमेरिका के ये कदम “दोनों देशों की साझा आकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाते”। मंत्रालय ने भारतीय पेशेवरों के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों को “अनुचित और बेहद आपत्तिजनक” बताया।

ऐसी शब्दावली का सहारा लेना, जिसके साथ दर्दनाक ऐतिहासिक और औपनिवेशिक विरासत के अर्थ जुड़े हैं, बेहद आपत्तिजनक है।

विदेश मंत्रालय, बयान, 9 अक्टूबर 2026 (दिप्रिंट और बिज़नेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक)

मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर “उसकी अर्थव्यवस्था और नवाचार तंत्र में योगदान देने वाले उच्च शिक्षित और कुशल लोग” हैं और प्रतिभाओं की आवाजाही “दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए फायदेमंद” है। बिज़नेस टुडे के मुताबिक, भारत इस मामले पर अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में है।

कंपनियों ने क्या कहा

टीसीएस ने कहा कि वह श्रम विभाग के किसी भी निर्देश का पालन करेगी। कंपनी ने 9 अक्टूबर को कहा, “पिछले दो साल में हमारे पर्म आवेदन इकाई अंकों में थे, इसलिए हमें उम्मीद नहीं है कि इस कार्यक्रम पर रोक से हमारी कार्यबल रणनीति और ग्राहकों के साथ काम पर असर पड़ेगा।” कंपनी ने अगले पांच साल में अमेरिका में 15,000 और लोगों को नौकरी देने की अपनी योजना दोहराई।

रॉयटर्स के मुताबिक, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट, इंफोसिस, एचसीएल टेक्नोलॉजीज़, विप्रो और कैपजेमिनी ने टिप्पणी के अनुरोध का तुरंत जवाब नहीं दिया। बिज़नेस टुडे के मुताबिक, 9 अक्टूबर को भारतीय आईटी शेयरों में तेज़ी रही, टीसीएस करीब 5% और निफ्टी आईटी सूचकांक 2% चढ़ा।

और क्या लंबित है

गल्फ न्यूज़ के मुताबिक, 7 अक्टूबर को एक अलग अमेरिकी प्रस्ताव की घोषणा हुई, जिसके तहत ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी) के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों की सिफारिश करने वाले विश्वविद्यालयों पर 70,000 डॉलर का शुल्क लगाया जाएगा। यह अभी लागू नहीं हुआ है।