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संयुक्त राष्ट्र में भारत की पाकिस्तान को दो टूक: कब्ज़े वाला कश्मीर खाली करो, अपने नागरिकों की फ़िक्र करो

अल्पसंख्यक अधिकारों पर महासभा की एक चर्चा में भारतीय राजनयिक रघु पुरी ने कहा कि पाकिस्तान ने मंच का इस्तेमाल प्रचार के लिए किया। इस हफ़्ते संयुक्त राष्ट्र में दोनों देशों के बीच यह तीसरी तीखी नोकझोंक है।

संपादकीय डेस्क से · न्यूयॉर्कप्रकाशित
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय (फ़ाइल फ़ोटो)
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Jakub Hałun / Wikimedia Commons, CC BY 4.0

मुख्य बातें

  1. भारतीय राजनयिक रघु पुरी ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि पाकिस्तान को अवैध कब्ज़े वाला इलाका खाली करना होगा।
  2. वे अल्पसंख्यक मुद्दों के विशेष प्रतिवेदक के साथ महासभा की तीसरी समिति की चर्चा में बोल रहे थे।
  3. भारत ने कहा कि अल्पसंख्यकों की रक्षा मुख्य रूप से देशों का संप्रभु दायित्व है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अल्पसंख्यक अधिकारों पर हुई एक चर्चा में पाकिस्तान पर मंच का प्रचार के लिए दुरुपयोग करने का आरोप लगाया और कहा कि वह जम्मू-कश्मीर के अपने कब्ज़े वाले हिस्से खाली करे। न्यूयॉर्क में महासभा में यह तीखी नोकझोंक हुई।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के फ़र्स्ट सेक्रेटरी रघु पुरी महासभा की तीसरी समिति में अल्पसंख्यक मुद्दों के विशेष प्रतिवेदक के साथ संवाद के दौरान पाकिस्तान को जवाब दे रहे थे।

पुरी ने कहा, “पाकिस्तान ने हमेशा की तरह इस मंच का प्रचार के लिए दुरुपयोग किया। जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है।” उन्होंने कहा, “पाकिस्तान को अपने अवैध कब्ज़े वाला इलाका खाली करना होगा।”

उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के प्रतिनिधियों को अपनी सेना के निर्देशों पर चलने के बजाय अपने नागरिकों की भलाई पर ध्यान देना चाहिए। जिस टिप्पणी के जवाब में भारत बोला, पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का वह बयान सार्वजनिक नहीं हुआ है।

अल्पसंख्यक और राज्य

अपने बाकी वक्तव्य में पुरी ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर भारत का नज़रिया रखा। उन्होंने कहा कि यह ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से देशों की अपनी है और इसमें संप्रभु समानता का सिद्धांत मार्गदर्शक होना चाहिए।

उन्होंने भारत के संविधान में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए दिए गए संरक्षणों का हवाला दिया और कहा कि ये देश की विविधता वाली सभ्यतागत परंपरा को दिखाते हैं।

एक हफ़्ते में तीसरी भिड़ंत

तीसरी समिति सामाजिक, मानवीय और मानवाधिकार से जुड़े सवालों पर काम करती है। इस हफ़्ते वहां भारतीय राजनयिकों के तीखे जवाबों की कड़ी में यह ताज़ा मामला है।

गुरुवार को फ़र्स्ट सेक्रेटरी भाविका मंगलानंदन ने अंतिम संस्कार के अधिकारों पर एक चर्चा में समिति को याद दिलाया था कि 1999 के करगिल युद्ध में मारे गए अपने सैनिकों के शव तक पाकिस्तान ने वापस नहीं लिए थे। उन्होंने कहा था कि जो देश अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं कर सकता, उसे भारत को उपदेश देने का कोई हक नहीं। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान अंतिम संस्कारों में हुए भेदभाव पर प्रतिवेदक की रिपोर्ट के तरीके की भी आलोचना की थी।

हफ़्ते की शुरुआत में जबरन गुमशुदगी पर एक बहस में विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने चेतावनी दी थी कि मानवाधिकारों को राजनीतिक दबाव का औज़ार नहीं बनना चाहिए।

इसी समिति में डिप्टी सेक्रेटरी बरखा ताम्रकार ने न्याय व्यवस्था और जलवायु संकट पर एक अलग रिपोर्ट पर बोलते हुए भारत के राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और स्वतंत्र न्यायपालिका को पर्यावरण संरक्षण के स्तंभ बताया।

इन सभी बैठकों में भारत ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान की टिप्पणियों का एक ही तरह से जवाब दिया है: इस क्षेत्र को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए बहस को इस ओर मोड़ना कि पाकिस्तान अपने लोगों के साथ कैसा बर्ताव करता है। रविवार तड़के तक पुरी की टिप्पणी पर पाकिस्तान की ओर से कोई जवाब सामने नहीं आया था।