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भारत ने युवाओं पर यूएन रैपोर्टेयर की रिपोर्ट को कहा "रिपोर्ट के लिबास में सुनी-सुनाई बातें"

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत ने जीना रोमेरो के इस निष्कर्ष को खारिज किया कि मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक न्याय पर बोलने वाले भारतीय युवाओं को प्रताड़ना झेलनी पड़ती है।

संपादकीय डेस्क से · न्यूयॉर्कप्रकाशित
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय (फ़ाइल फ़ोटो)
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Jakub Hałun / Wikimedia Commons, CC BY 4.0

मुख्य बातें

  1. भारतीय राजनयिक अनुज स्वरूप ने कहा कि रिपोर्ट "अनाम प्रस्तुतियों" पर टिकी है।
  2. उन्होंने विशेष रैपोर्टेयर से कहा कि वे "बदनाम करने से पहले जांच लें"।
  3. रिपोर्ट में भारतीय युवाओं के बनाए एक "व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन" का जिक्र था।

भारत ने युवाओं के साथ बर्ताव पर संयुक्त राष्ट्र के एक मानवाधिकार विशेषज्ञ की रिपोर्ट को खारिज कर दिया है और संयुक्त राष्ट्र महासभा से कहा है कि भारतीय युवाओं के बारे में उसके दावे “सुनी-सुनाई बातें” हैं।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के फर्स्ट सेक्रेटरी अनुज स्वरूप ने महासभा की तीसरी समिति में यह बयान दिया। मौका था शांतिपूर्ण सभा और संगठन की स्वतंत्रता के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टेयर जीना रोमेरो के साथ संवाद का।

रोमेरो की रिपोर्ट में कहा गया है कि “भारत के युवाओं ने मानसिक स्वास्थ्य या लैंगिक न्याय पर चर्चा करने पर प्रतिशोध या कलंकित किए जाने की शिकायत की।” रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि भारतीय युवाओं ने एक “व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन” बनाया है। भारत में इसे कॉकरोच जनता पार्टी की ओर इशारा माना गया।

स्वरूप ने कहा कि रिपोर्ट सिर्फ फुटनोट में दी गई “अनाम प्रस्तुतियों” पर टिकी है। उन्होंने कहा, “दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी पर अनाम और बिना जांचे दावों के आधार पर लगाया गया व्यापक आरोप सबूत नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के लिबास में सुनी-सुनाई बातें हैं, और मेरा प्रतिनिधिमंडल इसे पूरी तरह खारिज करता है।”

उन्होंने आगे कहा, “जो अधिदेशधारी 1.4 अरब लोगों के बारे में आम राय बनाने के लिए अनाम जानकारियों पर निर्भर रहती हैं, वे अपने ही अधिदेश के साथ अन्याय करती हैं। हम इन विशेष रैपोर्टेयर से आग्रह करते हैं कि बदनाम करने से पहले जांच लें।”

उन्होंने रिपोर्ट के ही उदाहरण को उसके खिलाफ इस्तेमाल किया। स्वरूप ने पूछा, “किस दमनकारी देश में एक व्यंग्यात्मक युवा पार्टी सरकार से सवाल करती है, राजधानी तक मार्च करती है और फिर वरिष्ठ राष्ट्रीय नेताओं के साथ बैठकर बात करती है?”

उन्होंने कहा कि इस गर्मी में सार्वजनिक परीक्षाओं में गड़बड़ियों को लेकर छात्रों के प्रदर्शन के बाद सरकार ने कुछ ही हफ्तों में सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम में संशोधन किया, पेपर लीक की सजा दोगुनी की और हर राज्य में परीक्षा धोखाधड़ी के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाईं।

भारत इस महीने प्रदर्शनों से निपटने के तरीके पर विदेशी आलोचना का कई बार जवाब दे चुका है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणियां भी शामिल हैं।