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दिल्ली प्रदर्शन पर टिप्पणी को लेकर विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ शनिवार के प्रदर्शन में मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने को कहा था। भारत ने इसे अनुचित दखल बताया।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
जिनेवा में पैले विल्सन, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय का मुख्यालय
जिनेवा में पैले विल्सन, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय का मुख्यालयNick-D / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने 10 अक्टूबर को कहा कि दिल्ली प्रदर्शन में मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत रिहा किया जाए।
  2. जिनेवा में भारत के मिशन ने उसी दिन जवाब दिया कि ये चिंताएं बेबुनियाद और अनुचित दखल हैं।
  3. 11 अक्टूबर को विदेश मंत्रालय ने कहा कि कार्यालय ने हमारे पड़ोस में प्रदर्शनों पर हिंसक कार्रवाई को नज़रअंदाज़ किया।
  4. 10 अक्टूबर को दिल्ली में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या के अनुमान करीब 2,000 से 7,000 से ज़्यादा तक हैं।

विदेश मंत्रालय ने रविवार को शनिवार के दिल्ली प्रदर्शन में बड़े पैमाने पर हिरासत को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की चिंताओं को खारिज कर दिया। मंत्रालय ने इन्हें “अनुचित” और “भारत के आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य दखल” बताया। उसने कार्यालय पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया।

दो दिन में भारत का यह दूसरा जवाब था। शनिवार देर रात जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने कहा था कि कार्यालय की चिंताएं “बेबुनियाद” हैं और “अनुचित दखल” हैं।

संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ने क्या कहा

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने 10 अक्टूबर को कहा कि वह “दिल्ली में आज के बड़े प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान प्रदर्शनकारियों, प्रदर्शन के नेताओं, नागरिक संगठनों के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों की बड़े पैमाने पर हिरासत की खबरों से चिंतित” है।

उसके प्रवक्ता थमीन अल-खीतान ने कहा: “हम अधिकारियों से अपील करते हैं कि वे शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का पूरा सम्मान सुनिश्चित करें और इसे पूरी तरह लागू करें।” कार्यालय ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पाबंदियों को “आवश्यकता और आनुपातिकता की कड़ी कसौटी पर खरा उतरना चाहिए” और भारतीय अधिकारी सुनिश्चित करें कि कानून लागू करने वाले बल “अधिकतम संयम बरतें”।

मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय, बयान, 10 अक्टूबर 2026 (अंग्रेज़ी से अनुवाद)

भारत के दो जवाब

जिनेवा मिशन ने कहा कि भारत “दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां शांतिपूर्ण सभा का अधिकार हमारे संविधान से मिला है और मज़बूत संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया इसकी रक्षा करते हैं”। उसने कहा कि भारतीय नागरिक इस अधिकार का इस्तेमाल “सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उचित पाबंदियों के अधीन” करते हैं। मिशन ने यह भी कहा कि ओएचसीएचआर को “निष्पक्षता और गैर-चयनात्मकता के अपने अधिदेश के मुताबिक, दूसरी जगहों पर हो रहे बड़े प्रदर्शनों पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए”।

रविवार को विदेश मंत्रालय के बयान ने यह बात दोहराई और उससे आगे गया। मंत्रालय ने कहा, “हमारी कानून-व्यवस्था एजेंसियां पूरी तरह कानून के मुताबिक काम करती हैं, और किसी भी शिकायत के निवारण के लिए हमारी अदालतें सबके लिए खुली हैं।” इसके बाद उसने कार्यालय के अपने रिकॉर्ड पर सवाल उठाए।

हमारे पड़ोस में प्रदर्शनों पर हुई हिंसक कार्रवाइयों पर कोई टिप्पणी नहीं की गई, न ही उसके अपने आसपास कानून-व्यवस्था की कार्रवाइयों पर। ऐसे दोहरे मापदंड उसकी साख को ही कमज़ोर करते हैं और बहुपक्षवाद में भरोसा घटाते हैं।

विदेश मंत्रालय, बयान, 11 अक्टूबर 2026 (अंग्रेज़ी से अनुवाद)

घटनाक्रम

  1. 10 अक्टूबर 2026मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर-मंतर मार्च पुलिस ने रोका; दिल्ली में हज़ारों लोग हिरासत में।
  2. 10 अक्टूबर 2026संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों की रिहाई की मांग की।
  3. 10 अक्टूबर 2026, देर रातजिनेवा में भारत के मिशन ने चिंताओं को बेबुनियाद और अनुचित दखल बताया।
  4. 11 अक्टूबर 2026सुप्रीम कोर्ट ने विशेष बैठक में कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में न लिया जाए।
  5. 11 अक्टूबर 2026विदेश मंत्रालय ने चिंताओं को अनुचित बताया और कार्यालय पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया।

किस प्रदर्शन पर हुई यह बहस

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), छात्र संगठनों और दूसरों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के लिए यह मार्च बुलाया था। चुनाव आयोग और भाजपा किसी गड़बड़ी से इनकार करते हैं।

पुलिस ने जंतर-मंतर को सील कर दिया, जगह-जगह जांच चौकियां बनाईं और मध्य दिल्ली के कारोबारी इलाके में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया। हिरासत में लिए गए लोगों में सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके, यूट्यूबर ध्रुव राठी और वकील प्रशांत भूषण शामिल थे। टीवी चैनलों के मुताबिक ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और पिनराई विजयन को भी हिरासत में लिया गया।

संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने दिल्ली का आंकड़ा करीब 2,000 बताया, दिल्ली पुलिस सूत्रों ने करीब 2,500, और दूसरे अनुमान 7,000 से ज़्यादा के हैं। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रदर्शनकारियों को “अराजक तत्व” कहा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सरकार ने “मदर ऑफ डेमोक्रेसी” को “मज़ल्ड डेमोक्रेसी” (मुंह बंद किया गया लोकतंत्र) बना दिया है।

रविवार की विशेष बैठक में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) की जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि शांतिपूर्ण ढंग से जुटे लोगों को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, और कानून-व्यवस्था की स्थिति के अधीन मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए।

मूल दस्तावेज़