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इंडियाएआई कंप्यूट सब्सिडी: मॉडल बनाने वालों को ₹1,058 करोड़, शोधकर्ताओं को करीब ₹10 करोड़

इंडियाएआई कंप्यूट पोर्टल की मंज़ूरियां बताती हैं कि अब तक तय ₹1,275 करोड़ में से ज़्यादातर रकम नौ फाउंडेशन मॉडल बनाने वालों को गई है, जबकि छात्रों और शिक्षाविदों को 1% से भी कम मिला है।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु की मुख्य इमारत (फाइल चित्र) (फ़ाइल फ़ोटो)
भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु की मुख्य इमारत (फाइल चित्र) (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: en:User:Mohammadulhaque. / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0

मुख्य बातें

  1. नौ फाउंडेशन मॉडल बनाने वालों को तय ₹1,275 करोड़ में से ₹1,058 करोड़ मिले हैं।
  2. शोधकर्ताओं, छात्रों और फेलो को करीब ₹10.14 करोड़ यानी 0.8% मिला है।
  3. शिक्षाविदों का कहना है कि ऊंची लागत, धीमा पंजीकरण और ग्रांट के नियम उन्हें सब्सिडी वाले जीपीयू से दूर रखते हैं।

एआई डेवलपरों को सस्ती कंप्यूटिंग क्षमता देने वाली भारत की प्रमुख योजना का ज़्यादातर पैसा अब तक बड़े मॉडल बनाने वाली कुछ कंपनियों के पास गया है, जबकि विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं और छात्रों को बहुत छोटा हिस्सा मिला है।

इंडियाएआई मिशन की कंप्यूट सब्सिडी के तहत अब तक तय ₹1,275 करोड़ में से नौ फाउंडेशन मॉडल बनाने वाली संस्थाओं को ₹1,058 करोड़ मिले हैं। शोधकर्ताओं, छात्रों और फेलो को मिलाकर करीब ₹10.14 करोड़ मिले हैं, यानी कुल का 0.8%। ये आंकड़े इंडियाएआई कंप्यूट पोर्टल पर 8 अक्टूबर तक दर्ज 304 कंप्यूट मंज़ूरियों से निकले हैं।

पैसा कहां गया

सर्वम एआई की सब्सिडी अब उसके पूरे बिल ₹246.72 करोड़ के बराबर दर्ज है। आईआईटी बॉम्बे के नेतृत्व वाले भारतजेन को फाउंडेशन मॉडल बनाने वालों में सबसे बड़ा आवंटन मिला है।

शोधकर्ताओं और शिक्षा जगत के लिए बनी अलग श्रेणी में ₹172.81 करोड़ हैं, लेकिन इसका ज़्यादातर हिस्सा एक ही मंज़ूरी में चला गया है: भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के एक प्रोफेसर की स्थापित कंपनी ज़ेनटीक एआईटेक इनोवेशन्स को 2,080 गूगल टीपीयू। यह अकेली मंज़ूरी उन 1,050 टीपीयू से ज़्यादा है, जो प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय के दिसंबर 2025 के एक श्वेत पत्र में पूरे पूल के लिए गिने गए थे।

मिशन के पास अपना कोई जीपीयू नहीं है। उसके पैनल में शामिल निजी क्लाउड कंपनियां कंप्यूटिंग देती हैं, और एनवीडिया के एच100 चिप की टेंडर दर करीब ₹140 प्रति घंटा है।

शोधकर्ता क्या कहते हैं

शिक्षाविदों का कहना है कि योजना का झुकाव भाषा मॉडलों की ओर बहुत ज़्यादा है, विश्वविद्यालय प्रयोगशालाओं के लिए लागत अब भी बहुत ऊंची है, पंजीकरण धीमा है और रिसर्च ग्रांट के नियमों के चलते क्लाउड कंप्यूटिंग का भुगतान मुश्किल है।

आईआईएससी बेंगलुरु में एसोसिएट प्रोफेसर प्रतोष ए.पी. ने कहा, “इन्हीं बुनियादी ढांचे की दिक्कतों की वजह से अच्छे इंजीनियर देश छोड़ देते हैं।” फिर भी वे योजना के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा, “इंडियाएआई मिशन हमारे देश को एआई में संप्रभु बनाने की दिशा में निश्चित रूप से सही कदम है।”

आईआईटी दिल्ली में सिविल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर मनबेंद्र सहरिया ज़्यादा खुलकर बोले। उन्होंने कहा, “यह सोचकर बहुत बुरा लगता है कि हम अपने क्षेत्र में सबसे आगे हो सकते हैं, लेकिन नहीं हो पाते क्योंकि हम गरीब हैं।”

स्टार्टअप्स की भी पोर्टल से शिकायतें हैं। वायनारा टेक्नोलॉजीज़ के संस्थापक ध्रुमिल बारोट ने पहले से भुगतान की शर्त के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “मुझे कंप्यूट आरक्षित करने के लिए भुगतान करना पड़ता है, और फिर अगर मंज़ूरी मिलती है तो 40 प्रतिशत वापस मिलता है।”

आगे क्या

देश में कम इस्तेमाल को देखते हुए सरकार इस पर विचार कर रही है कि पैनल के जीपीयू सप्लायरों को विदेश में भी क्षमता बेचने दी जाए। सब्सिडी के बंटवारे पर पूछे गए सवालों का इंडियाएआई मिशन ने अब तक सार्वजनिक रूप से जवाब नहीं दिया है।