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इसरो ने गगनयान के मॉड्यूल अलग होने के परीक्षण पूरे किए, मानवरहित जी1 उड़ान की ओर कदम

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के इंजीनियरों ने दोबारा प्रवेश से पहले क्रू कैप्सूल के सर्विस मॉड्यूल से अलग होने का पल दोहराया, और कैप्सूल की प्रणालियां झटके के बाद भी सही सलामत रहीं।

संपादकीय डेस्क से · तिरुवनंतपुरमप्रकाशित
तिरुवनंतपुरम का विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)
तिरुवनंतपुरम का विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Gazal world / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. इसरो ने गगनयान के लिए क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल के अलग होने के परीक्षणों की शृंखला पूरी की।
  2. परीक्षणों में जांचा गया कि कैप्सूल के एवियोनिक्स और हीट शील्ड पायरोटेक्निक झटका झेल पाते हैं।
  3. रोबोट व्योममित्र को ले जाने वाली मानवरहित जी1 उड़ान का लक्ष्य 2026 है, पर तारीख तय नहीं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने गगनयान ऑर्बिटल मॉड्यूल के दोनों हिस्सों के अलग होने के परीक्षणों की एक शृंखला पूरी कर ली है। भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम की पहली मानवरहित उड़ान से पहले यह ज़मीन पर होने वाली आखिरी अहम जांचों में से एक थी।

इसरो ने शुक्रवार को बताया कि तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) में हुए इन परीक्षणों ने “अलगाव प्रणाली के डिज़ाइन की पर्याप्तता को प्रमाणित” किया और दिखाया कि क्रू कैप्सूल के भीतर की अहम प्रणालियां इस घटना का झटका झेल सकती हैं।

किस पल की जांच हुई

गगनयान ऑर्बिटल मॉड्यूल दो हिस्सों से बना है। क्रू मॉड्यूल में अंतरिक्ष यात्री रहते हैं, और उसके नीचे लगा सर्विस मॉड्यूल बिजली और प्रणोदन देता है। दोनों एक अलगाव प्रणाली और अम्बिलिकल लाइनों से जुड़े होते हैं, जो उनके बीच बिजली और तरल पदार्थों की आपूर्ति करती हैं। कक्षा में रहने के दौरान दोनों एक इकाई की तरह उड़ते हैं।

वायुमंडल में दोबारा प्रवेश से पहले क्रू मॉड्यूल को साफ-सुथरे ढंग से अलग होना होता है। यह पायरोटेक्निक और जेटिसन घटनाओं की एक बेहद सटीक शृंखला से होता है, जिसमें छोटे विस्फोटक पल भर में जोड़ काट देते हैं।

वीएसएससी ने पूरे क्रू और सर्विस मॉड्यूल ढांचे की नकल करता एक परीक्षण सेटअप बनाया, जिसमें बड़ी संख्या में उपकरण लगे थे। इंजीनियरों ने कई अम्बिलिकल कनेक्शन काटने समेत पूरी अलगाव प्रक्रिया चलाई और देखा कि झटके का कैप्सूल पर क्या असर हुआ। इसरो के मुताबिक एवियोनिक्स और इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, पिछली और शंक्वाकार हीट शील्ड, डिप्लॉयेबल अम्बिलिकल शील्ड, और अपराइटिंग सिस्टम व थर्मल एवं ह्यूमिडिटी कंट्रोल सिस्टम के पायरोटेक्निक उपकरण, सब परीक्षण में खरे उतरे।

जी1 कहां तक पहुंचा

इन नतीजों का मकसद पहले मानवरहित गगनयान मिशन जी1 के लिए भरोसा बढ़ाना है, जिसे इसरो के मुताबिक 2026 में लॉन्च करने का लक्ष्य है। इसमें आधा मानवाकार रोबोट व्योममित्र जाएगा, जो चालक दल की जगह लेगा। लॉन्च की कोई तारीख घोषित नहीं हुई है।

यह उड़ान कई बार टल चुकी है। पहले इसकी योजना दिसंबर 2020 के लिए थी और बाद में दिसंबर 2025 के लिए। इसरो प्रमुख वी नारायणन ने जून में कहा था कि यह इस साल की आखिरी तिमाही में होने की उम्मीद है, और सितंबर में दोहराया कि यह इसी साल उड़ेगी।

इस साल परीक्षण लगातार आगे बढ़े हैं। अप्रैल में जी1 क्रू मॉड्यूल को पैराशूट से उतरने की जांच के लिए विमान से गिराया गया था, और इसरो ने समुद्र में उतरने के बाद कैप्सूल को सीधा करने वाले अपराइटिंग सिस्टम और अम्बिलिकल को जोड़ने-अलग करने वाली प्रणालियों को भी योग्य घोषित किया है। भारत की पहली मानवयुक्त उड़ान का लक्ष्य 2027 है।

मूल दस्तावेज़