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स्पेसएक्स की तिमाही आय 14.6 अरब डॉलर, रॉकेट और स्टारलिंक से आगे निकला एआई

स्पेसएक्स की आधी से ज़्यादा आय अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से आ रही है। वहीं उसकी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक भारत में शुरू होने के लिए अब भी सुरक्षा मंजूरी का इंतज़ार कर रही है।

संपादकीय डेस्क से · सैन फ्रांसिस्कोप्रकाशित

मुख्य बातें

  1. स्पेसएक्स ने मंगलवार को 14.6 अरब डॉलर की तीसरी तिमाही आय दर्ज की, हर कारोबार में बढ़त रही।
  2. ग्रोक, कर्सर और क्लाउड कंप्यूटिंग कारोबार के ज़रिए एआई अब कंपनी की 52% आय देता है।
  3. कोलोसस II और स्टारशिप पर काम के बीच पूंजीगत खर्च 19.6 अरब डॉलर पहुंचा।

कमाई के हिसाब से देखें तो स्पेसएक्स अब रॉकेट कंपनी से ज़्यादा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी है। कंपनी ने मंगलवार को तीसरी तिमाही में 14.6 अरब डॉलर की आय दर्ज की, और इसमें 52% हिस्सा उसके एआई कारोबार का रहा। यह निवेशकों की उम्मीद से बेहतर रहा।

कंपनी के हर कारोबार में बढ़त हुई, लेकिन सबसे बड़ा योगदान उस कारोबार का रहा जिसे स्पेसएक्स ने नया नाम “सुपर इंटेलिजेंस” दिया है। इसमें ग्रोक चैटबॉट और उसके एजेंट, हाल ही में खरीदा गया कोडिंग टूल कर्सर और एआई कंप्यूटिंग क्षमता किराये पर देने वाला क्लाउड कारोबार शामिल है। इस क्लाउड कारोबार के पास अब 1.7 गीगावाट की कंप्यूटिंग क्षमता है।

तिमाही की पूरी कमाई कामकाज से नहीं आई। करीब 1 अरब डॉलर की आय बिटकॉइन की कीमतों में सुधार से जुड़ी थी, और नतीजों में संबंधित पक्ष से आय की एक मद भी है, जो किसी दूसरी कंपनी में स्पेसएक्स के निवेश से जुड़ी हो सकती है।

अगले विस्तार पर खर्च

तिमाही में स्पेसएक्स का पूंजीगत खर्च 19.6 अरब डॉलर रहा। यह पैसा उसकी दूसरी बड़ी डेटा सेंटर परियोजना कोलोसस II और स्टारशिप में लग रहा है। स्टारशिप वह भारी रॉकेट है, जिसकी ज़रूरत कंपनी को स्टारलिंक उपग्रहों की नई पीढ़ी भेजने और आगे चलकर अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाने के लिए है।

जून में नैस्डैक पर सूचीबद्ध हुई कंपनी के ये आंकड़े दिखाते हैं कि इलॉन मस्क ने कारोबार को किस हद तक एआई की ओर मोड़ दिया है। रॉकेट और सैटेलाइट इंटरनेट ने स्पेसएक्स को खड़ा किया, लेकिन इन आंकड़ों के हिसाब से अब वे उसकी आधी से कम आय देते हैं।

भारत में स्टारलिंक का इंतज़ार जारी

भारतीय उपयोगकर्ताओं की नज़र सबसे ज़्यादा स्टारलिंक पर है, और यह सेवा यहां अब तक शुरू नहीं हुई है। स्टारलिंक, रिलायंस जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और यूटेलसैट वनवेब, तीनों को सैटेलाइट संचार सेवा के लिए जीएमपीसीएस लाइसेंस मिल चुका है। लेकिन स्पेक्ट्रम मिलने और कनेक्शन बेचने से पहले हर कंपनी को सुरक्षा आकलन और दूसरी शर्तें पूरी करनी हैं।

संचार मंत्रालय ने किसी भी कंपनी को तरजीह देने से इनकार किया है और कहा है कि तीनों लगभग एक ही चरण में हैं। यह देरी अब सार्वजनिक विवाद बन गई है। मस्क ने भारतीय कारोबारी हितों पर अपने टेलीकॉम कारोबार को बचाने के लिए स्टारलिंक को रोकने का आरोप लगाया और पूछा कि क्या रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी “भारत के असली बॉस” हैं। रिलायंस ने आरोप खारिज किया, कहा कि वह स्टारलिंक समेत हर प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है, और बताया कि जियो की अपनी सैटेलाइट सेवा भी मंजूरी का इंतज़ार कर रही है।

खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार अब एक ऐसे हार्डवेयर उपकरण पर विचार कर रही है, जो विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क और भारतीय उपयोगकर्ताओं के बीच लगेगा, ग्राहक के परिसर में या ग्राउंड स्टेशन पर, और पूरा सैटेलाइट ट्रैफिक इसी से होकर गुज़रेगा। मकसद विदेशी नियंत्रण वाले नेटवर्क पर कड़ी निगरानी है, जिसमें संघर्ष या सुरक्षा आपात स्थिति भी शामिल है। इसकी तकनीकी बारीकियां और समय-सीमा अभी तय नहीं हुई हैं।