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बैंकों की हालत पर अखिलेश यादव ने केंद्र से पूछे '12 सवाल'
सपा प्रमुख ने पूछा कि अगर बैंक मज़बूत हुए हैं तो बेचे क्यों जा रहे हैं, गांवों की शाखाएं क्यों बंद हो रही हैं और साइबर ठगी के शिकार लोगों को पैसा लौटने में देर क्यों होती है।

मुख्य बातें
- अखिलेश यादव ने वित्तीय सेवा विभाग को टैग कर एक्स पर 'बारह साल, बारह सवाल' पोस्ट किए।
- उन्होंने पूछा कि बैंक मज़बूत हुए हैं तो गांवों में शाखाएं और एटीएम क्यों बंद हो रहे हैं।
- सूची में साइबर ठगी, सिबिल स्कोर की गड़बड़ी और बैंकों में रुकी भर्ती के सवाल भी हैं।
समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शनिवार को केंद्र के इस दावे को चुनौती दी कि देश के बैंक मज़बूत हुए हैं। उन्होंने “बारह साल, बारह सवाल” शीर्षक से बारह सवालों की सूची पोस्ट की और वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग को टैग किया।
हर सवाल एक ही तरह शुरू हुआ। पहला सवाल था, “अगर बैंक मज़बूत हुए हैं, तो उन्हें बेचा क्यों जा रहा है?” इसके बाद उन्होंने गरीबों के खातों से कटने वाले शुल्क और “बार-बार केवाईसी के नाम पर” लोगों को उनका पैसा न देने का मुद्दा उठाया।
शाखाओं से सिबिल स्कोर तक
कन्नौज से लोकसभा सांसद यादव ने पूछा कि गांवों में बैंक शाखाएं और एटीएम क्यों बंद किए जा रहे हैं, जिससे “लोगों को नकदी के लिए भटकना पड़ रहा है”, और किसानों, छात्रों और छोटे दुकानदारों को “बिना बिचौलियों और बिना गारंटर” के कर्ज़ क्यों नहीं मिलता।
उन्होंने पूछा कि साइबर ठगी के शिकार लोगों को पैसा वापस पाने के लिए थानों और बैंकों के चक्कर क्यों काटने पड़ते हैं, डिजिटल लेनदेन फेल होने पर पैसा कई दिन क्यों अटका रहता है, और होम लोन व एजुकेशन लोन की ब्याज दरें इतनी ऊंची क्यों हैं। उन्होंने लिखा कि सिबिल स्कोर में ज़रा-सी गलती पर युवाओं को डिफॉल्टर बताया जा रहा है।
आखिरी सवाल बैंक कर्मचारियों पर था: उनकी जायज़ मांगें क्यों पूरी नहीं हो रहीं, नई भर्ती क्यों नहीं हो रही, और मौजूदा कर्मचारियों पर इतना दबाव क्यों है कि “ग्राहक सेवा ही चरमरा रही है”। उन्होंने यह भी पूछा कि बैंकों से भारी कर्ज़ लेकर विदेश भागे लोगों को वापस लाकर सज़ा क्यों नहीं दी जा रही।
यह पोस्ट उस प्रेस कॉन्फ्रेंस के एक दिन बाद आई, जिसमें यादव ने लखनऊ में कहा था कि वे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उसके ज़रिये चुनाव में धांधली की, उनके शब्दों में, साज़िश के खिलाफ हैं।