राज्यमहाराष्ट्र
वसूली के मामले में गैरकानूनी गिरफ्तारी पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के कारोबारी को ₹5 लाख दिलवाए
अदालत ने पाया कि आज़ाद मैदान पुलिस ने बिपिन अग्रवाल को गिरफ्तार करने के बाद एफआईआर दर्ज की, गिरफ्तारी मेमो की तारीखें बदलीं और उन्हें गलत तरीके से आदतन अपराधी बताया।

मुख्य बातें
- राज्य को दो हफ्ते में ₹5 लाख देने होंगे, जिन्हें वह ज़िम्मेदार अफसरों से वसूल सकता है।
- अदालत ने पीएसआई महेश लामखड़े के खिलाफ तत्काल निलंबन समेत कार्रवाई का आदेश दिया।
- कारण दर्ज किए बिना रिमांड बढ़ाने वाले मजिस्ट्रेटों की जांच होगी।
बॉम्बे हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया है कि वह 2017 में वसूली के एक मामले में गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार किए गए मुंबई के एक कारोबारी को ₹5 लाख दे। अदालत ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें हिरासत में रखने वाले मजिस्ट्रेट की जांच का भी निर्देश दिया।
जस्टिस ए एस गडकरी और जस्टिस कमल खाटा की पीठ ने गुरुवार को सुनाए और शुक्रवार को सामने आए फैसले में कहा, “साफ है कि यह डेवलपर द्वारा पुलिस से मिलीभगत करके प्रक्रिया के घोर दुरुपयोग का मामला है।”
बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल अपनी बुज़ुर्ग सास की ओर से पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के रूप में उनकी हाउसिंग सोसाइटी के पुनर्विकास को लेकर सेठ एंड सोनल डेवलपर्स से बात कर रहे थे। डेवलपर्स के ₹2 लाख का अग्रिम देने के बाद आज़ाद मैदान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और भारतीय दंड संहिता की धारा 384 के तहत वसूली का मामला दर्ज किया।
अदालत ने पाया कि एफआईआर गिरफ्तारी के बाद दर्ज हुई, गिरफ्तारी मेमो की तारीखों पर ओवरराइटिंग की गई और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41ए का नोटिस उन्हें हिरासत में लेने के बाद दिया गया। साफ रिकॉर्ड होने के बावजूद पुलिस रिकॉर्ड में उन्हें आदतन अपराधी बताया गया जिसके फरार होने का खतरा है, और पीठ ने कहा कि पुलिस के पास उन्हें गैंगस्टर या वसूलीबाज़ दिखाने का कोई आधार नहीं था। 64वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने उन्हें कुल 26 दिन पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेजा था।
पीठ ने दोहराया कि पुलिस किसी को सिर्फ पूछताछ के लिए गिरफ्तार नहीं कर सकती और उसे दर्ज करना होगा कि हिरासत क्यों ज़रूरी है।
राज्य को दो हफ्ते में मुआवज़ा देना होगा और वह इसे दोषी अधिकारियों के वेतन से वसूल सकता है। अदालत ने सब-इंस्पेक्टर महेश लामखड़े के खिलाफ तत्काल निलंबन समेत अनुशासनात्मक कार्यवाही का आदेश दिया, और फैसले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के सामने रखा ताकि बिना सोचे-समझे और कारण दर्ज किए बिना बार-बार रिमांड बढ़ाने वाले मजिस्ट्रेटों पर कार्रवाई हो।