समझिएचुनाव
तृणमूल किसकी? चुनाव आयोग पार्टी में फूट का फैसला कैसे करता है, और स्पीकर का मामला अलग क्यों है
बागी सांसदों को मंगलवार तक अयोग्यता याचिकाओं का जवाब देना है, और चुनाव आयोग 30 अक्टूबर को तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न की लड़ाई पर सुनवाई करेगा। दो मंच, दो कानून और दो बिल्कुल अलग सवाल।
संक्षेप में
जब कोई मान्यता प्राप्त पार्टी टूटती है, तो चुनाव आयोग 1968 के चुनाव चिह्न आदेश के पैराग्राफ 15 के तहत तय करता है कि कौन सा गुट, अगर कोई, नाम और चिह्न रखेगा। हाल के मामलों में आयोग ने बहुमत की कसौटी अपनाई और सबसे ज़्यादा विधायकों-सांसदों की गिनती पर भरोसा किया, जैसा 2023 में शिंदे की शिवसेना के मामले में हुआ। यह सवाल इससे अलग है कि तृणमूल के 20 बागी सांसदों की सदस्यता जाएगी या नहीं, जिसका फैसला लोकसभा स्पीकर दलबदल विरोधी कानून के तहत करते हैं। इस साल शिवसेना की अपील सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि क्या विधायी बहुमत से ही तय होना चाहिए कि पार्टी किसकी है।
30 अक्टूबर को चुनाव आयोग क्या तय करेगा?
यह कि दोनों गुटों में से असली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस कौन है, और पार्टी का नाम और उसका “जोड़ा घास-फूल” चिह्न किसे मिलेगा।
एक गुट पार्टी की संस्थापक ममता बनर्जी का है। दूसरे का नेतृत्व पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं, जिनका खेमा कहता है कि इस साल विधानसभा चुनाव में हार के बाद संगठन में बहुमत उसके साथ है। आयोग 30 अक्टूबर को नई दिल्ली में दोनों को सुनेगा।
तब तक पार्टी की पहचान पर रोक लगी है। 17 सितंबर को आयोग ने फैसला दिया कि 6 अक्टूबर को हुए नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनावों में कोई भी गुट तृणमूल का नाम या चिह्न इस्तेमाल नहीं करेगा। ममता का गुट “ममता ऑल तृणमूल कांग्रेस” नाम और फुटबॉल चिह्न पर लड़ा, ऋतब्रत का “डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस” नाम और लिफाफा चिह्न पर।
आयोग किस अधिकार के तहत फैसला करता है?
चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत।
यह पैराग्राफ आयोग को अधिकार देता है कि अगर किसी मान्यता प्राप्त पार्टी में कई गुट खुद को वही पार्टी बताएं, तो वह तय करे कि असली पार्टी कौन है, या कोई नहीं। उसका फैसला सभी गुटों पर बाध्यकारी होता है।
इस अधिकार की परीक्षा 1969 में कांग्रेस की फूट के बाद हुई। आयोग ने जगजीवन राम के नेतृत्व वाले गुट का साथ दिया, और 1972 में सादिक अली बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पैराग्राफ 15 और बहुमत की कसौटी, दोनों को सही ठहराया। कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव चिह्न किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है।
बहुमत किसके पास है, यह कैसे तय होता है?
सिद्धांत में पार्टी के उद्देश्यों, उसके संविधान और संख्या को देखकर। व्यवहार में, हाल के वर्षों में, विधायकों और सांसदों की गिनती से।
शिवसेना का मामला इसे दिखाता है। फरवरी 2023 में आयोग ने पाया कि उद्देश्यों की कसौटी से कोई मदद नहीं मिलती, क्योंकि किसी पक्ष ने उस पर ज़्यादा दलील नहीं दी। उसने पार्टी के 2018 के संविधान को अलोकतांत्रिक मानकर किनारे कर दिया, यह कहते हुए कि उसने ताकत एक छोटे समूह में समेट दी थी। बची संख्या। एकनाथ शिंदे के साथ शिवसेना के 55 में से 40 विधायक और 18 में से 13 लोकसभा सांसद थे, और आयोग ने उनके गुट को नाम और तीर-कमान चिह्न दे दिया। एक साल बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की फूट में भी उसने ऐसा ही रुख अपनाया और अजित पवार के गुट का साथ दिया।
दो मामले, दो मंच
क्या स्पीकर का मामला भी यही है?
नहीं। वह सीटों का मामला है, चिह्न का नहीं।
जून में 2024 में चुने गए तृणमूल के 29 में से 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को समर्थन का ऐलान किया। लोकसभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर ओम बिरला से दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्य ठहराने की मांग की। बागियों को मंगलवार, 20 अक्टूबर तक जवाब देना है।
यह कानून सदस्यों को तभी बचाता है जब मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय पर सहमत हों। बागी कहते हैं कि वे यह शर्त पूरी करते हैं। तृणमूल का कहना है कि सांसदों का एक समूह पार्टी के बिना अपने दम पर विलय नहीं कर सकता। जो भी हो, स्पीकर का फैसला यह तय नहीं करेगा कि तृणमूल किसकी है, और आयोग का फैसला यह तय नहीं करेगा कि लोकसभा की सीट किसके पास रहेगी।
क्या अदालतें नियम बदल सकती हैं?
मुमकिन है। शिवसेना पर आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, और 5 अगस्त की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची व जस्टिस वी मोहना की पीठ ने विधायकों की संख्या को दिए गए वज़न पर सवाल उठाए। जस्टिस बागची ने कहा, “राजनीतिक दल का कोई भी वैध फैसला विधायक दल के बहुमत की इच्छा पर भी भारी पड़ना चाहिए।”
बंगाल के लिए यह अहम है। ऋतब्रत बनर्जी का दावा संगठन पर टिका है, और ममता बनर्जी का दावा उसके नेतृत्व पर। अगर कोर्ट आयोग से कहता है कि वह विधायी संख्या से आगे जाकर पार्टी के अपने ढांचे को देखे, तो तृणमूल की सुनवाई शिवसेना और एनसीपी के मामलों से बिल्कुल अलग सबूतों पर टिक सकती है।
सुनवाई के बाद क्या होगा?
आयोग किसी भी गुट के पक्ष में, या किसी के भी पक्ष में नहीं, फैसला दे सकता है, और हारने वाला पक्ष अदालत जा सकता है। सितंबर की सुनवाई के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने कहा था कि तृणमूल “किसी परिवार की पुश्तैनी संपत्ति नहीं है”। अब आयोग को बताना है कि कानून की नज़र में यह किसकी संपत्ति है।