संसददल-बदल
टीएमसी के 20 बागी सांसदों को लोकसभा अध्यक्ष ने 20 अक्टूबर तक जवाब देने की मोहलत दी
जून में टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई से जुड़े सांसदों को यह तीसरी बार मिली मोहलत है। सुप्रीम कोर्ट ने अध्यक्ष से जल्द फैसला करने को कहा है, पर कोई समय-सीमा तय नहीं की।

मुख्य बातें
- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय ने अभिषेक बनर्जी की अयोग्यता याचिकाओं पर 20 बागी सांसदों को 20 अक्टूबर तक जवाब देने का समय दिया है।
- सांसदों ने 8 अक्टूबर को 15 दिन और मांगे थे, यह तीसरी बार था जब उन्होंने मोहलत मांगी।
- अभिषेक बनर्जी की याचिकाएं जून 2026 से अध्यक्ष के पास लंबित हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अध्यक्ष को कार्रवाई करनी होगी, लेकिन उसने कोई समय-सीमा तय नहीं की है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों को दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी अयोग्यता की मांग वाली याचिकाओं पर जवाब देने के लिए 20 अक्टूबर तक का समय दिया है। सांसदों ने 8 अक्टूबर को 15 दिन और मांगे थे। अगस्त के आखिर में नोटिस जारी होने के बाद यह तीसरी बार है जब उन्होंने मोहलत मांगी।
ये याचिकाएं टीएमसी के महासचिव और लोकसभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी ने सदस्य, लोकसभा (दल-परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1985 के नियम 6 के तहत दायर की थीं। ये जून से लंबित हैं।
आंकड़ों में मामला
- 20 बागी सांसदसभी 2024 में टीएमसी के चुनाव चिह्न पर जीते थे और अब एनसीपीआई के साथ हैं।
- 29 2024 में जीते टीएमसी सांसदबागियों का कहना है कि उनके 20 सांसद लोकसभा में पार्टी के दो-तिहाई से ज़्यादा हैं।
- 3 महीने सुप्रीम कोर्ट का मानक2020 में कोर्ट ने कहा था कि अध्यक्ष को आम तौर पर इतने समय में ऐसी याचिका पर फैसला करना चाहिए।
- 3 बार मोहलत मांगीसात दिन की पहली समय-सीमा पहले 22 सितंबर, फिर 8 अक्टूबर और अब 20 अक्टूबर तक बढ़ी है।
सांसदों पर अयोग्यता का खतरा क्यों
14 जून को टीएमसी के 20 सांसदों ने घोषणा की कि वे नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करेंगे और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन करेंगे। एनसीपीआई एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है, जिसने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था। यह टूट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद हुई।
इन 20 सांसदों में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, माला रॉय और यूसुफ पठान शामिल हैं। घोष दस्तीदार ने 14 जून को कहा, “टीएमसी के दो-तिहाई सांसदों ने अलग बैठने की व्यवस्था के लिए अध्यक्ष को पत्र दिया है।”
दसवीं अनुसूची सदस्यों को तभी बचाती है जब उनके विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय पर सहमत हों। बागी सांसदों का कहना है कि उनका कदम वैध विलय है। टीएमसी का तर्क है कि उसके चुनाव चिह्न पर जीते सांसदों ने दूसरी पार्टी में जाकर अपनी सदस्यता छोड़ दी है, और विधायकों का कोई समूह मूल पार्टी के बिना अपने दम पर विलय नहीं कर सकता।
मानसून सत्र से पहले अध्यक्ष ने इन 20 सांसदों को सदन में अलग बैठने की अनुमति दी थी। उन्होंने इन्हें अलग पार्टी के रूप में मान्यता नहीं दी है।
अदालत और घड़ी
अभिषेक बनर्जी देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) गए। 25 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी मोहना की पीठ ने 20 सांसदों को नोटिस जारी किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि अध्यक्ष पहले ही नोटिस जारी कर चुके हैं।
“सवाल नोटिस जारी करने का नहीं है; सवाल एक तय समय में कार्यवाही पूरी करने का है।”
लोकसभा सचिवालय के नोटिस में सांसदों को जवाब के लिए सात दिन दिए गए थे। बाद में अध्यक्ष ने इसे 22 सितंबर तक बढ़ा दिया।
23 सितंबर की अगली सुनवाई में टीएमसी के वकील ने कोर्ट के 2020 के कीशम मेघचंद्र सिंह फैसले का हवाला दिया, जिसमें असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर तीन महीने को अध्यक्ष के फैसले की अधिकतम सीमा माना गया था। मेहता ने समय-सीमा तय करने का विरोध किया। उन्होंने कहा, “कोर्ट कोई समय-सीमा तय करने पर विचार न करे।” जस्टिस बागची ने कहा कि “अध्यक्ष को सौंपी गई संवैधानिक भूमिका पर ध्यान देना होगा”, लेकिन पीठ ने कोई तारीख तय नहीं की। बताया गया कि मामला छह हफ्ते बाद फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
25 सितंबर को अध्यक्ष ने सांसदों की चार हफ्ते और देने की मांग ठुकरा दी और दो हफ्ते, यानी 8 अक्टूबर तक का समय दिया। उसी समय-सीमा के दिन सांसदों ने 15 दिन और मांगे।
“जवाब भेजने की हमारी समय-सीमा आज खत्म हो रही है। हम लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर 15 दिन और मांग रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि उनके वकील जवाब के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ अभी जुटा नहीं पाए हैं। अध्यक्ष के कार्यालय ने अब 20 अक्टूबर तक का समय दिया है, जो उनकी मांगी गई 22 अक्टूबर की तारीख से दो दिन कम है।
घटनाक्रम
- 14 जून 2026टीएमसी के 20 सांसदों ने एनसीपीआई में विलय की घोषणा की और अध्यक्ष से मिले।
- जून 2026अभिषेक बनर्जी ने सभी 20 के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं दायर कीं।
- 18 जुलाई 2026अध्यक्ष ने बागियों को अलग सीटें दीं; मान्यता पर फैसला नहीं।
- 25 अगस्त 2026सुप्रीम कोर्ट ने 20 सांसदों को नोटिस जारी किया; लोकसभा के नोटिस में सात दिन का समय।
- 3 सितंबर 2026समय-सीमा 22 सितंबर तक बढ़ी।
- 23 सितंबर 2026सुप्रीम कोर्ट ने प्रगति पर ज़ोर दिया, पर समय-सीमा तय नहीं की।
- 25 सितंबर 2026अध्यक्ष ने चार हफ्ते की मांग ठुकराई, 8 अक्टूबर तय की।
- 8 अक्टूबर 2026सांसदों ने 15 दिन और मांगे।
- 20 अक्टूबर 2026जवाब की नई समय-सीमा।
आगे क्या
जवाब आने के बाद अध्यक्ष तय करेंगे कि 20 सांसद अयोग्य हैं या नहीं। दसवीं अनुसूची के तहत यह फैसला अंतिम होता है, लेकिन अदालतें सीमित आधारों पर इसकी समीक्षा कर सकती हैं।
याचिकाएं जून में दायर हुई थीं, यानी करीब चार महीने पहले, जो 2020 में सुप्रीम कोर्ट के तय किए तीन महीने के मानक से पहले ही ज़्यादा है। बागियों के जवाब सुप्रीम कोर्ट की अगली संभावित सुनवाई से पहले आने हैं। संसद के शीतकालीन सत्र की तारीखों की घोषणा अभी नहीं हुई है।