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यूरोप का रूसी एलएनजी आयात 9.5% बढ़ा, ट्रंप ने यूरोपीय संघ पर पाखंड का आरोप लगाया
वॉशिंगटन ने रूस पर प्रतिबंध वाला कानून ठंडे बस्ते में डाला है, और आंकड़े दिखाते हैं कि इस साल यूरोपीय बंदरगाहों पर पिछले साल से ज़्यादा रूसी आर्कटिक गैस पहुंची। भारत रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार बना हुआ है।

मुख्य बातें
- जनवरी से सितंबर के बीच 1.2 करोड़ टन से ज़्यादा रूसी आर्कटिक एलएनजी यूरोपीय बंदरगाहों पर पहुंची, 9.5% ज़्यादा।
- सितंबर में फ्रांस का रूसी एलएनजी आयात अगस्त के मुकाबले दोगुने से ज़्यादा हो गया।
- सितंबर में भारत ने 3.6 अरब यूरो का रूसी कच्चा तेल खरीदा, चीन के बाद सबसे ज़्यादा।
वॉशिंगटन पर मॉस्को के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाने वाला यूरोप खुद अब भी बड़े पैमाने पर रूसी गैस खरीद रहा है। ऊर्जा शोधकर्ताओं के जुटाए आंकड़े यही दिखाते हैं।
अभियान समूह उर्गेवाल्ड के मुताबिक इस साल जनवरी से सितंबर के बीच रूस के आर्कटिक इलाके से 1.2 करोड़ टन से ज़्यादा तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) यूरोपीय संघ के बंदरगाहों पर पहुंची, जो एक साल पहले से 9.5% ज़्यादा है। सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के मुताबिक अकेले सितंबर में यूरोपीय संघ ने 81.7 करोड़ यूरो की रूसी पाइपलाइन गैस और 61.5 करोड़ यूरो की रूसी एलएनजी आयात की।
उस महीने एलएनजी का सबसे बड़ा ख़रीदार फ्रांस रहा, 44.6 करोड़ यूरो के साथ, जो अगस्त की ख़रीद के दोगुने से ज़्यादा है। इसके बाद नीदरलैंड्स 11.6 करोड़ यूरो पर रहा। पाइपलाइन आयात में हंगरी 41.4 करोड़ यूरो के साथ सबसे आगे रहा, उसके बाद स्लोवाकिया और बुल्गारिया। यूरोपीय संघ की योजना अगले साल रूसी गैस आयात पूरी तरह बंद करने की है।
ज़ुबानी जंग
ये आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल और गैस के ख़रीदारों को दंडित करने वाले नए अमेरिकी कानून के लगभग सभी प्रावधान टाल दिए हैं, जिनमें पांच सबसे बड़े आयातकों पर 100% तक के टैरिफ़ शामिल थे। ट्रंप ने यूरोपीय देशों पर “पाखंड” का आरोप लगाया है। इस महीने की शुरुआत में अमेरिका ने अप्रैल 2027 तक रूसी डीज़ल की बिक्री पर प्रतिबंधों में भी ढील दी थी।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि डीज़ल सौदा “नकारात्मक संदेश देता है”। यूरोपीय संघ के अर्थव्यवस्था प्रमुख वाल्दिस दोम्ब्रोव्स्किस ने कहा कि डीज़ल की ये मात्राएं “किसी भी व्यापक आर्थिक महत्व की नहीं” हैं।
वियना इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक स्टडीज़ के अर्थशास्त्री वासिली अस्त्रोव का अनुमान है कि प्रति बैरल हर अतिरिक्त डॉलर में से करीब 60 सेंट रूसी सरकार के खज़ाने में जाएंगे।
भारत कहां खड़ा है
सीआरईए के मुताबिक सितंबर में भारत रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार रहा। उसने 3.6 अरब यूरो का तेल खरीदा, जबकि चीन ने 6 अरब यूरो का। भारत ने 16.1 करोड़ यूरो के रूसी तेल उत्पाद भी खरीदे। अमेरिकी छूट से दोनों देशों पर सेकेंडरी टैरिफ़ का तात्कालिक खतरा टल गया है, हालांकि वॉशिंगटन कभी भी ये दंड फिर से लागू कर सकता है।