LokVox

समझिएकूटनीति

भारतीय जगहों के चीनी 'मानक नाम': ये सूचियां कैसे काम करती हैं और भारत हर बार जवाब क्यों देता है

2017 से बीजिंग अरुणाचल प्रदेश की जगहों के चीनी नामों की पांच सूचियां जारी कर चुका है। इस महीने भारत ने लद्दाख की 28 जगहों को नाम दिए, तो चीन ने इसे गैरकानूनी बताया। ये सूचियां क्या हैं, ज़मीन पर इनसे क्या बदलता है और दोनों राजधानियां इन पर इतना ध्यान क्यों देती हैं।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित

संक्षेप में

चीन का नागरिक मामलों का मंत्रालय समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ों, नदियों, दर्रों और बस्तियों के 'मानक नामों' की सूची जारी करता है। बीजिंग इस इलाके को 'ज़ांगनान' यानी दक्षिणी तिब्बत कहकर उस पर दावा करता है। 2017 से अब तक पांच सूचियों में 89 जगहें शामिल हैं। इन नामों से न सेना हिलती है, न यह बदलता है कि ज़मीन पर शासन किसका है, पर दोनों पक्ष सरकारी नक्शे पर दर्ज नाम को अपने दावे का बयान मानते हैं और एक-दूसरे को जवाब देते हैं, ताकि चुप्पी को कभी सहमति न समझा जाए।

चीन क्या करता आ रहा है?

चीन का नागरिक मामलों का मंत्रालय समय-समय पर उन जगहों के चीनी नामों की सूची जारी करता है, जिन पर भारत अरुणाचल प्रदेश के हिस्से के रूप में शासन करता है।

चीन इस राज्य के ज़्यादातर हिस्से, करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर, पर दावा करता है और इसे “ज़ांगनान” यानी दक्षिणी तिब्बत कहता है। इन सूचियों में हर पहाड़, नदी, दर्रे, झील या बस्ती को चीनी नाम दिया जाता है, जो चीनी अक्षरों, तिब्बती लिपि और पिनयिन में लिखा होता है, अक्सर सटीक निर्देशांक के साथ। बीजिंग इन्हें “मानक” भौगोलिक नाम कहता है, यही शब्द वह चीन के भीतर की जगहों के नामकरण के लिए भी इस्तेमाल करता है।

अब तक कितनी सूचियां आई हैं?

2017 से पांच, जिनमें कुल 89 जगहें हैं।

पहली सूची 2017 में छह नामों के साथ आई। 2021 में 15 नामों की दूसरी सूची आई, फिर 2023 में 11 और 2024 में 30 नाम। 27 नामों वाली पांचवीं सूची 12 मई 2025 को जारी हुई।

अरुणाचल प्रदेश के लिए चीन की नाम-सूचियां

  1. 2017पहली सूची, 6 नाम
  2. 2021दूसरी सूची, 15 नाम
  3. अप्रैल 2023तीसरी सूची, 11 नाम
  4. वसंत 2024चौथी सूची, 30 नाम, 1 मई 2024 से लागू
  5. 12 मई 2025पांचवीं सूची, 27 नाम, कुल संख्या 89

चीन किन नियमों के तहत ऐसा करता है?

ये सूचियां जगहों के नामों से जुड़े चीन के राष्ट्रीय नियमों के तहत जारी होती हैं, जिन्हें स्टेट काउंसिल ने 2022 में संशोधित किया।

ये नियम तय करते हैं कि जगहों के नाम कैसे रखे, बदले और दर्ज किए जाएं। 2024 की सूची के साथ जारी लागू करने के उपायों में कहा गया कि चीन के क्षेत्रीय दावों को नुकसान पहुंचा सकने वाले विदेशी भाषा के नाम बिना अनुमति उद्धृत या अनूदित न किए जाएं। यानी बीजिंग जिन जगहों पर दावा करता है, उनके लिए चीन के सरकारी नक्शों और दस्तावेज़ों में भारतीय नहीं, चीनी नाम ही इस्तेमाल होने चाहिए।

सूचियों का समय अक्सर उन मौकों के बाद रहा है जिन पर चीन ने आपत्ति जताई। 2024 की सूची प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सेला सुरंग खोलने के कुछ हफ्ते बाद आई, जिससे तवांग तक हर मौसम में सड़क संपर्क मिलता है, और तब भी जब अमेरिका ने कहा था कि वह अरुणाचल प्रदेश को भारतीय क्षेत्र मानता है।

क्या किसी नाम से ज़मीन पर कुछ बदलता है?

नहीं। नक्शे पर लिखा नाम न एक भी सैनिक को हिलाता है, न यह बदलता है कि किसी जगह का प्रशासन कौन चलाता है।

अरुणाचल प्रदेश भारत का राज्य है, जहां उसकी अपनी चुनी हुई सरकार, भारतीय प्रशासन और भारतीय मतदाता हैं। चीनी नाम चीनी नक्शों, चीन के सरकारी मीडिया और चीन के सरकारी दस्तावेज़ों में दिखते हैं। उन जगहों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर इनका कोई असर नहीं होता।

इनसे एक कागज़ी रिकॉर्ड ज़रूर बनता है। हर सूची चीन के दावे को औपचारिक रूप से दोहराती है, ऐसे रूप में जिसका हवाला बाद में बातचीत या सार्वजनिक बहस में दिया जा सके।

भारत हर बार जवाब क्यों देता है?

क्योंकि सीमा विवाद में जिस सरकारी दावे का जवाब न दिया जाए, उसे बाद में दूसरे पक्ष की स्वीकृति के तौर पर पेश किया जा सकता है।

भारत के जवाब छोटे और एक जैसे रहे हैं। मार्च 2024 में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन के दावों को “हास्यास्पद” बताया और कहा: “दावे शुरू से हास्यास्पद थे और आज भी हास्यास्पद हैं।” मई 2025 में पांचवीं सूची आने पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसे “व्यर्थ और बेतुकी कोशिशें” बताकर खारिज किया और कहा: “रचनात्मक नामकरण से उस निर्विवाद सच्चाई में कोई बदलाव नहीं होगा” कि अरुणाचल प्रदेश “भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा” है।

इन जवाबों का एक घरेलू मकसद भी है। अरुणाचल के लोग और उनके चुने हुए नेता चाहते हैं कि नई दिल्ली साफ कहे कि इस राज्य पर कोई चर्चा नहीं हो सकती।

इस महीने लद्दाख में क्या हुआ?

इस बार नाम भारत ने रखे और आपत्ति चीन ने की।

2 अक्टूबर को सरकार ने लद्दाख की 28 चोटियों, दर्रों, ग्लेशियरों, घाटियों और झीलों के आधिकारिक नामों का ऐलान किया और उन्हें केंद्रशासित प्रदेश के सर्वे ऑफ इंडिया नक्शे पर दर्ज किया। इनमें ज़ोरावर पीक, कनिष्क पीक और गुरु रिनपोछे झील शामिल हैं। इनमें से कई जगहें अक्साई चिन में या उसके पास हैं, वह ऊंचा पठार जिस पर 1950 के दशक से चीन का कब्ज़ा है और जिसे भारत लद्दाख का हिस्सा मानता है।

13 अक्टूबर को चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने इस कदम को “गैरकानूनी, अमान्य और शून्य” बताया और कहा: “चीन ने तथाकथित केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख को कभी मान्यता नहीं दी।” जायसवाल ने उसी दिन जवाब दिया: “चीनी पक्ष का कितना भी इनकार इस स्थापित तथ्य को नहीं बदल सकता।”

तो क्या यह नया दौर है?

बहस वही है, बस अब दोनों तरफ से चल रही है।

बरसों तक भारत चीन की सूचियों का जवाब देता रहा, पर अपनी सूची जारी नहीं की। अपने दावे वाले इलाके में, चीन के कब्ज़े वाले हिस्सों समेत, जगहों को नाम देना भारत के तरीके को चीन के तरीके के करीब लाता है: सरकारी नक्शे पर एक औपचारिक रिकॉर्ड कि हर देश किस इलाके को अपना मानता है। कोई पक्ष नहीं मानता कि दूसरा उसके नाम अपना लेगा। दोनों मानते हैं कि जब कभी सीमा पर बात होगी, यह रिकॉर्ड मायने रखेगा, इसलिए हर नई सूची के साथ यह सिलसिला चलते रहने की संभावना है।