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भारत-न्यूज़ीलैंड व्यापार समझौता: आज से क्या बदलेगा, और किसे बाहर रखा गया
पीयूष गोयल और टॉड मैक्ले ने अप्रैल में जिस मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तखत किए थे, वह मंगलवार से लागू हो रहा है। दोनों देशों ने क्या खोला, डेयरी बाहर क्यों रही, और उपभोक्ताओं, किसानों और निर्यातकों के लिए इसका क्या मतलब है।
संक्षेप में
भारत-न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता 27 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में हुआ था और 20 अक्टूबर से लागू हो रहा है। न्यूज़ीलैंड पहले दिन से भारत के सभी निर्यात पर शुल्क हटा देगा। भारत अपनी करीब 70% टैरिफ लाइनों पर शुल्क घटाएगा या धीरे-धीरे खत्म करेगा, जो दोनों देशों के बीच 95% व्यापार मूल्य को कवर करती हैं; इनमें से 30% लाइनों, जैसे भेड़ का मांस, ऊन और लकड़ी, पर शुल्क तुरंत खत्म होगा। दूध, चीज़, मक्खन जैसे मुख्य डेयरी उत्पाद, चीनी, प्याज़, चना और बादाम बाहर रखे गए हैं, जबकि सेब, कीवी और मनुका शहद सिर्फ कोटा के तहत आएंगे। समझौते में भारतीय पेशेवरों के लिए 5,000 अस्थायी वर्क वीज़ा और न्यूज़ीलैंड की ओर से $20 अरब निवेश जुटाने में मदद की प्रतिबद्धता भी है।
समझौता क्या है?
एक मुक्त व्यापार समझौता, जो भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच ज़्यादातर सामान पर शुल्क घटाता है और भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए कुछ रास्ते खोलता है।
बातचीत मार्च 2025 में शुरू हुई और उसी साल दिसंबर में पूरी हो गई, जो भारत की व्यापार वार्ताओं के हिसाब से तेज़ है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और न्यूज़ीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैक्ले ने 27 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में इस पर दस्तखत किए, प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन की मौजूदगी में। लक्सन ने इसे “पीढ़ी में एक बार होने वाला समझौता” कहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह “दो जीवंत लोकतंत्रों के बीच आर्थिक संबंधों को मज़बूत करता है”।
न्यूज़ीलैंड की संसद ने सितंबर में समझौते को लागू करने वाला कानून पास किया। लक्सन के अपने गठबंधन की पार्टी न्यूज़ीलैंड फर्स्ट, ग्रीन पार्टी और ते पाति माओरी ने इसका विरोध किया। इसके बाद दोनों सरकारों ने अपनी प्रक्रियाएं पूरी कीं, और समझौता मंगलवार, 20 अक्टूबर से लागू हो रहा है।
भारत को क्या मिलता है?
पहले दिन से न्यूज़ीलैंड को होने वाले हर भारतीय निर्यात पर शून्य शुल्क।
न्यूज़ीलैंड के शुल्क पहले से कम हैं, लेकिन वह सिरेमिक, कालीन, कारों और कार पुर्ज़ों जैसे सामान पर 10% तक शुल्क लेता है। ये शुल्क खत्म होंगे। कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते-चप्पल, इंजीनियरिंग सामान और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों को सबसे ज़्यादा फायदे की उम्मीद है। कपड़ा मंत्रालय ने कहा कि समझौता “परिधान, घरेलू वस्त्र और हथकरघा के लिए शून्य शुल्क पहुंच” देता है।
न्यूज़ीलैंड ने भारत में $20 अरब के निवेश में मदद करने और करीब 118 सेवा क्षेत्र खोलने का वादा भी किया है। उसके नियामक तुलनीय नियामकों की गुड मैन्युफैक्चरिंग और क्लिनिकल प्रैक्टिस निरीक्षण रिपोर्टें मानेंगे, जिससे भारतीय दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की मंज़ूरी तेज़ होनी चाहिए।
और न्यूज़ीलैंड को क्या मिलता है?
भारत को बेचे जाने वाले ज़्यादातर सामान पर कम शुल्क, लेकिन एक साथ नहीं।
भारत अपनी 70.03% टैरिफ लाइनों पर शुल्क घटा रहा है, जो मिलकर दोनों देशों के व्यापार मूल्य का करीब 95% हैं। करीब 30% लाइनें, जिनमें लकड़ी, ऊन, भेड़ का मांस और कच्ची खाल शामिल हैं, तुरंत शुल्क मुक्त हो जाएंगी। 35.6% लाइनों पर शुल्क तीन से 10 साल में खत्म होगा, और 4.37% लाइनों, जिनमें वाइन, दवाएं और कुछ एल्युमिनियम व इस्पात उत्पाद हैं, पर शुल्क शून्य नहीं बल्कि कम होगा। पिछले हफ्ते वित्त मंत्रालय की अधिसूचना वाले पहले चरण में ताज़ा और फ्रोज़न भेड़ का मांस शुल्क मुक्त हुआ है, और $2.50 प्रति किलो या उससे महंगी कीवी पर 15% शुल्क तय हुआ है।
दोनों देशों के बीच सामान का व्यापार छोटा है, सालाना करीब $1.3 अरब, इसलिए भारत के कुल व्यापार संतुलन पर असर मामूली रहेगा।
भारत-न्यूज़ीलैंड एफटीए में कौन क्या खोल रहा है
डेयरी बाहर क्यों रखी गई?
क्योंकि भारत में डेयरी करोड़ों छोटे किसानों की रोज़ी-रोटी है, और भारत ने इसे लगातार अपने व्यापार समझौतों से बाहर रखा है।
दूध, क्रीम, व्हे, दही और चीज़ बाहर हैं, और चीनी, कृत्रिम शहद, प्याज़, चना, मटर, मक्का और बादाम भी। न्यूज़ीलैंड के निर्यात में डेयरी की बड़ी हिस्सेदारी है, और वहां की डेयरी कंपनीज़ एसोसिएशन ने मक्खन और चीज़ बाहर रहने पर निराशा जताई। बल्क शिशु आहार और मिल्क एल्ब्यूमिन जैसी कुछ छोटी चीज़ों को कोटा के तहत सीमित पहुंच मिली है।
इसी वजह से न्यूज़ीलैंड फर्स्ट के नेता विंस्टन पीटर्स ने समझौते का विरोध किया। उनका तर्क था कि इसमें डेयरी के लिए बहुत कम है और भारतीय आप्रवासन बढ़ेगा।
क्या सेब और कीवी सस्ते होंगे?
थोड़े, और सीमा के भीतर।
सेब, कीवी और मनुका शहद टैरिफ-रेट कोटा के तहत आएंगे: तय मात्रा पर कम शुल्क लगेगा और उससे ज़्यादा पर सामान्य दर। आयात पर न्यूनतम आयात मूल्य और मौसमी खिड़कियां भी लागू होंगी, जिनका मकसद हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के बागवानों को बचाना है। अगर आयात अचानक बढ़ता है तो सुरक्षा उपाय वाले प्रावधान के तहत कोई भी देश शुल्क फिर लगा सकता है। दोनों सरकारें कीवी, सेब और शहद पर एक कृषि उत्पादकता साझेदारी पर भी सहमत हुई हैं, जिसका लक्ष्य भारतीय उत्पादकों की पैदावार और आमदनी है।
नौकरियां और वीज़ा?
भारतीय पेशेवरों के लिए एक छोटा लेकिन नया रास्ता।
न्यूज़ीलैंड कुशल भारतीयों को तीन साल तक के लिए 5,000 अस्थायी रोज़गार वीज़ा देगा, आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में। वह हर साल 1,000 युवा भारतीयों को वर्किंग हॉलिडे वीज़ा भी देगा और छात्रों को काम के बेहतर अधिकार मिलेंगे। इन प्रावधानों की न्यूज़ीलैंड फर्स्ट के उपनेता शेन जोन्स ने तीखी आलोचना की और कहा कि “आप्रवासन को चुपके से मुक्त व्यापार समझौते में घुसा दिया गया है”। न्यूज़ीलैंड में भारतीय समुदाय के नेताओं ने उनकी टिप्पणियों की निंदा की।
आगे क्या?
आयातकों को अब हर खेप को वित्त मंत्रालय की अधिसूचना की सही टैरिफ लाइन से मिलाना होगा और कम दर पाने के लिए साबित करना होगा कि सामान न्यूज़ीलैंड का है। चरणबद्ध कटौतियां अगले दशक में आएंगी। भारत के लिए समझौते की बड़ी अहमियत शायद कहीं और है: इससे दिखता है कि किसी बड़े कृषि निर्यातक देश के साथ डेयरी को अलग रखते हुए भी व्यापार समझौता हो सकता है, और यह नमूना वार्ताकार बड़े साझेदारों के साथ बातचीत में भी ले जाएंगे।