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पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 125 साल का सबसे सूखा मानसून
जून से सितंबर के बीच इस क्षेत्र में 1,017.1 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से एक चौथाई कम है। उभरते अल नीनो के बीच मेघालय, मणिपुर और बिहार सूखे रहे और पांच राज्यों ने सूखा घोषित किया।

मुख्य बातें
- पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 25.6% कम बारिश हुई, जो 1901 से रिकॉर्ड शुरू होने के बाद सबसे कम है।
- दुनिया की सबसे नम जगहों में गिना जाने वाला मेघालय 60% की कमी पर रहा।
- मौसम विभाग को अक्टूबर से दिसंबर तक ज़्यादातर भारत में सामान्य से कम बारिश का अनुमान है।
30 सितंबर को खत्म हुआ मानसून पूर्व और पूर्वोत्तर भारत के लिए अब तक का सबसे सूखा रहा। जलवायु संचार समूह क्लाइमेट ट्रेंड्स के भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, इस क्षेत्र में 1,367.3 मिमी की सामान्य बारिश के मुकाबले 1,017.1 मिमी बारिश हुई, यानी 25.6% की कमी। यह 125 साल के रिकॉर्ड में सबसे कम है। इससे पहले सबसे कम बारिश 2013 में 1,065.7 मिमी दर्ज हुई थी।
पूरे देश में मानसून सामान्य से 13% कम रहा, जो एक दशक का सबसे कमज़ोर मौसम है। विश्लेषण कमज़ोर बारिश को उभरते अल नीनो से जोड़ता है। अल नीनो प्रशांत महासागर के समय-समय पर गर्म होने की घटना है, जो अक्सर भारतीय मानसून को कमज़ोर कर देती है।
कहां नहीं बरसे बादल
सबसे बुरा हाल पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों का रहा। धरती की सबसे नम जगहों वाला मेघालय 60% कमी पर रहा और उसके 11 में से 10 ज़िलों में बारिश कम हुई। मणिपुर में 46% और अरुणाचल प्रदेश में 44% कम बारिश हुई। मैदानी इलाकों में बिहार 32% पीछे रहा, जहां 38 में से 33 ज़िलों में कमी रही, और असम 28% पीछे रहा, जहां 35 में से 22 ज़िले प्रभावित हुए।
केवल सिक्किम, नगालैंड और पश्चिम बंगाल में सामान्य से ज़्यादा बारिश हुई। दक्षिण प्रायद्वीप में भी मौसम खराब रहा, जहां बारिश सामान्य से 24% कम रही और यह 1901 के बाद चौथा सबसे कम आंकड़ा है। मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश लगभग सामान्य रही।
यह कमी एक लंबे सिलसिले का हिस्सा है। पिछले दस में से नौ साल पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में बारिश सामान्य से कम रही है, केवल 2020 अपवाद था। 2024 में कमी 14% और 2025 में 20% थी।
ऐसा क्यों हुआ
आईएमडी के पूर्व महानिदेशक के जे रमेश ने कहा कि इस मौसम में 14 कम दबाव वाले सिस्टम बने, जिनके कुल 77 दिन रहे, लेकिन इनमें से कोई भी बंगाल की खाड़ी में नहीं बना, जो इस क्षेत्र की बारिश का आम स्रोत है। ये पश्चिमी प्रशांत के सिस्टमों के अवशेष थे। उन्होंने चेतावनी दी कि गर्मी फरवरी में ही दस्तक दे सकती है।
स्काईमेट वेदर के महेश पलावत ने कहा कि कम दबाव वाले सिस्टम अब ज़मीन के ऊपर ज़्यादा देर टिक रहे हैं और अपनी ताकत बनाए रख रहे हैं, “आंशिक रूप से नमी की लगातार आपूर्ति के कारण”। भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान के रॉक्सी मैथ्यू कोल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अल नीनो पैदा नहीं करता, लेकिन पृष्ठभूमि का तापमान बढ़ाता है, जिससे उसका असर और तीखा होता है। उनके मुताबिक वनों की कटाई जैसे स्थानीय बदलाव इस असर को बढ़ा सकते हैं।
खेत, जलाशय और गर्मी
देश भर में 5 अक्टूबर तक धान का रकबा एक साल पहले के मुकाबले 15.56 लाख हेक्टेयर कम था। तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र ने सूखा घोषित किया है, और महाराष्ट्र की घोषणा राज्य के 75% हिस्से पर लागू है। 8 अक्टूबर को देश के 178 बड़े जलाशयों में भंडारण सामान्य का 87.08% था।
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के जी वी रामांजनेयुलु ने कहा कि किसान कम पानी वाली फसलों की ओर जाते दिख रहे हैं। उन्होंने चेताया कि भूजल का कम पुनर्भरण सिंचाई पर निर्भरता बढ़ाएगा।
सूखे महीने गर्म भी रहे। अगस्त 2026 भारत में 1901 के बाद का सबसे गर्म अगस्त था और सितंबर पांचवां सबसे गर्म।
आगे क्या
राहत के आसार कम हैं। पूर्वानुमानों के मुताबिक अक्टूबर से दिसंबर के दौरान अल नीनो के 1950 के बाद सबसे मज़बूत होने की 83% संभावना है और फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना लगभग पक्की है। आईएमडी के अनुमान में इन्हीं तीन महीनों में देश के ज़्यादातर हिस्से में सामान्य से कम बारिश दिखाई गई है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा कि राज्यों को “प्रतिक्रिया से तैयारी” की ओर बढ़ना होगा, और अगली गर्मी से पहले शुरुआती चेतावनी तंत्र और हीट एक्शन प्लान तैयार रखने होंगे।