रायहमारा मत
राघोपुर के बाद बिहार को नदी किनारे के गांवों के लिए गिनी हुई, जांची हुई और सुरक्षित नावें देनी होंगी
मंगलवार रात गंगा में तेरह बच्चे डूब गए। मुआवज़ा सुरक्षा नीति नहीं है। राज्य जानता है कि लोग नदी कहां से पार करते हैं, और अगले बाढ़ के मौसम से पहले वह इन रास्तों को सुरक्षित बना सकता है।

मंगलवार रात राघोपुर से गांव वालों को गंगा पार एक भोज में ले जा रही नाव वैशाली ज़िले में रामपुर श्यामचंद के पास पलट गई। सात लोगों को निकाल लिया गया। तेरह बच्चे, जिनमें कोई भी 15 साल से बड़ा नहीं था, नहीं बच सके। अब तक कोई नहीं बता पा रहा कि नाव पर कितने लोग थे: स्थानीय लोग 15 से 20 कहते हैं, इलाके के विधायक तेजस्वी यादव करीब 30।
यह आखिरी बात जितनी दिखती है, उससे ज़्यादा अहम है। जिस नाव पर सवार लोगों को किसी ने गिना नहीं, उस नाव को किसी ने जांचा भी नहीं।
जानी-पहचानी कहानी
राज्य ने वैसा ही जवाब दिया है जैसा हमेशा देता है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हर शोकाकुल परिवार के लिए ₹4 लाख का ऐलान किया, और प्रधानमंत्री ने ₹2 लाख और जोड़े। आपदा राहत टीमों और स्थानीय गोताखोरों ने रात भर तलाश की। यह सब सही है, पर इनमें से कुछ भी किसी एक बच्चे को पानी से बाहर नहीं रख पाता।
बिहार कई बार इस मोड़ पर आ चुका है। जनवरी 2017 में पटना के पास गंगा में एक ठसाठस भरी नाव पलटने से 24 लोग डूबे थे, उस दिन जब एक उत्सव के लिए भीड़ जुटी थी। नाव पर 60 से ज़्यादा लोग थे। तब बताया गया था कि उस हिस्से में चलने वाली करीब 50 नावों में से 30 से ज़्यादा पंजीकृत नहीं थीं, किसी पर लाइफ जैकेट नहीं थी, और सूरज ढलने के बाद नाव न चलाने का नियम आम तौर पर तोड़ा जाता था। सिर्फ पांच हफ्ते पहले, 8 सितंबर को, इसी ज़िले के तेरसिया दियारा में 11 लोगों को ले जा रही नाव बाढ़ के पानी में डूबे पत्थर से टकराकर पलट गई थी। एक नौजवान की मौत हुई।
राघोपुर नदी के बीच का टापू है। दियारा के लोगों के लिए देसी नाव सैर का साधन नहीं है। यही स्कूल, बाज़ार और अस्पताल जाने की बस है।
ज़्यादा नियमों के खिलाफ दलील
एक ईमानदार दलील यह है कि सैकड़ों किलोमीटर लंबी नदी के हर घाट पर राज्य पहरा नहीं दे सकता, और सख्त नियम नाविकों का धंधा ही छीन लेंगे और गांवों को कटा हुआ छोड़ देंगे। नाविक गरीब हैं, और कई पार-घाट स्वभाव से ही अनौपचारिक हैं।
हम मानते हैं कि पाबंदी से फायदे से ज़्यादा नुकसान होगा। पर विकल्प नावों पर रोक लगाने या उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने के बीच नहीं है। ज़्यादातर पार-घाट जाने-पहचाने हैं, समय जाना-पहचाना है, और सबसे व्यस्त दिन, त्योहार, भोज, हाट के दिन और बाढ़ के हफ्ते, पहले से पता होते हैं।
राज्य को क्या करना चाहिए
2021 का राष्ट्रीय अंतर्देशीय जलयान अधिनियम मुख्य रूप से इंजन वाली नावों के लिए बना है। बिना इंजन वाली नावों को किस श्रेणी में रखा जाए और उनकी निगरानी कैसे हो, यह बड़े पैमाने पर राज्यों पर छोड़ा गया है। बिहार को इस गुंजाइश का इस्तेमाल करना चाहिए।
पहला, किराये पर या नियमित सेवा के तौर पर यात्री ले जाने वाली हर नाव, इंजन वाली हो या नहीं, ज़िले में पंजीकृत हो, और उसके किनारे पर बड़े अंकों में उसकी सुरक्षित यात्री क्षमता लिखी हो। पंजीकृत नाविक को प्रशिक्षण दिया जा सकता है, और लिखी हुई क्षमता को किनारे पर खड़ा कोई भी व्यक्ति लागू करवा सकता है।
दूसरा, हर व्यस्त घाट पर राज्य के खर्च पर लाइफ जैकेट रखी जाएं, और कोई बच्चा उसके बिना नाव पर न चढ़े।
तीसरा, बाढ़ के मौसम में अंधेरा होने के बाद, आपात स्थिति को छोड़कर, नाव चलाना बंद हो। अगर इससे गांवों के पास आने-जाने का साधन नहीं बचता, तो जवाब दिन में कुछ और नावें हैं, रात में ज़्यादा जोखिम नहीं।
चौथा, बाढ़ और त्योहारों के दौरान सबसे व्यस्त पार-घाटों पर आपदा राहत टीमें तैनात रहें, नाव डूबने के बाद बुलाई न जाएं।
आखिर में, सरकार राघोपुर हादसे की जांच का आदेश दे और एक महीने के भीतर उसके नतीजे सार्वजनिक करे: नाव पर कितने लोग थे, नाव के पास लाइसेंस था या नहीं, और निगरानी की ज़िम्मेदारी किसकी थी। परिवारों को पैसा मिल गया है। उन्हें जवाब भी मिलना चाहिए, और अगली बार नदी पार करने वाले बच्चों को एक सुरक्षित नाव।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 13बच्चे डूबे, जब 13 अक्टूबर को राघोपुर में नाव पलटी
- 24लोगों की मौत हुई थी जनवरी 2017 में पटना के पास गंगा में नाव पलटने से
- 8 सितंबरइसी बाढ़ के मौसम में वैशाली के तेरसिया दियारा में पहले हुए हादसे की तारीख
मूल दस्तावेज़
- The Inland Vessels Act, 2021India Code, Legislative Department, 13 अगस्त 2021