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पाकिस्तान ने राजनाथ सिंह की चेतावनी की निंदा की, कहा अफगान वार्ता बिना शर्त नहीं होगी
इस्लामाबाद के विदेश कार्यालय ने भारतीय रक्षा मंत्री की टिप्पणी को उकसावे वाला बताया। काबुल के बारे में कहा कि हमले रोकने का एक जांचा जा सकने वाला तंत्र चाहिए और रूस की किसी औपचारिक मध्यस्थता की जानकारी नहीं है।
मुख्य बातें
- पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की टिप्पणी को खारिज करते हुए निंदा की।
- प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि अफगानिस्तान से बातचीत बिना शर्त नहीं होगी।
- उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद और तालिबान के बीच रूस की किसी औपचारिक मध्यस्थता की उन्हें जानकारी नहीं है।
पाकिस्तान ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उस चेतावनी को खारिज कर दिया है कि एक और आतंकी हमला हुआ तो भारत और ज़ोरदार जवाब देगा। उसी ब्रीफिंग में उसने अफगानिस्तान की तालिबान सरकार से किसी भी बातचीत के लिए सख्त शर्तें भी रखीं।
विदेश कार्यालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने शुक्रवार को इस्लामाबाद में साप्ताहिक ब्रीफिंग में कहा, “हम भारतीय रक्षा मंत्री की उकसावे वाली टिप्पणी को खारिज करते हैं और उसकी निंदा करते हैं।” उन्होंने कहा कि भारत को “पिछले साल के अनुभव से उचित सबक लेना चाहिए” और अपना, उनके शब्दों में, आक्रामक रवैया छोड़ देना चाहिए।
सिंह ने एक दिन पहले दिल्ली में नेशनल डिफेंस कॉन्क्लेव 2026 में भाषण दिया था। पिछले साल पाकिस्तान पर भारत के हमलों, ऑपरेशन सिंदूर, को याद करते हुए उन्होंने कहा था कि आतंकियों ने फिर हमला किया तो इससे बड़ा जवाब दिया जाएगा। नई दिल्ली ने इस्लामाबाद के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
काबुल के लिए शर्तें
अफगानिस्तान पर खान ने कहा कि पाकिस्तान बातचीत के लिए तैयार है और मित्र देशों की ईमानदार कोशिशों का स्वागत करता है, लेकिन “बातचीत बिना शर्त नहीं होगी।” उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद की “सिर्फ एक मांग है”: एक ऐसा तंत्र जिसकी जांच हो सके और जो यह पक्का करे कि अफगान ज़मीन से पाकिस्तान पर हमले पूरी तरह बंद हों।
पाकिस्तान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और उन दूसरे गुटों को ज़िम्मेदार ठहराता है जो उसके मुताबिक सीमा पार से काम करते हैं। तालिबान इन गुटों पर साफ रुख लेने से बचते रहे हैं।
रूस का कोई रास्ता नहीं
इस महीने की शुरुआत में अफगानिस्तान के लिए रूस के विशेष दूत ज़मीर काबुलोव ने कहा था कि दोनों पक्ष चाहें तो रूस विवाद सुलझाने में मदद कर सकता है। खान ने इसे ज़्यादा अहमियत नहीं दी। उन्होंने कहा, “फिलहाल मुझे रूस की किसी अलग, औपचारिक मध्यस्थता पहल पर चर्चा की जानकारी नहीं है।”
5 अक्टूबर को अफगानिस्तान पर मॉस्को फॉर्मेट बैठक बिना संयुक्त बयान के खत्म हुई थी, क्योंकि अफगानिस्तान में आतंकी नेटवर्क से जुड़ी भाषा पर पाकिस्तानी और अफगान प्रतिनिधिमंडलों में टकराव हो गया था। खान ने कहा कि काबुल ने वह शब्दावली मानने से इनकार कर दिया जिसे उसने एक साल पहले मान लिया था। उनके मुताबिक संयुक्त बयान का न आना अपने आप में सब कुछ कह देता है और दिखाता है कि तालिबान आतंकी गुटों पर प्रतिबद्धता से बच रहे हैं।
कई देशों ने दोनों पड़ोसियों को साथ लाने की कोशिश की है। क़तर और तुर्किये ने अक्टूबर 2025 में संघर्ष विराम कराया, सऊदी अरब ने बातचीत की मेज़बानी की, और चीन ने अप्रैल में उरुमची में एक दौर की बातचीत कराई। आतंकी गुटों पर मूल विवाद कोई नहीं सुलझा सका।
क्यों अहम
इन दोनों बयानों से इस्लामाबाद एक साथ अपनी दोनों सीमाओं पर सख्त नज़र आता है। देश के भीतर, संघीय सरकार ने 11 अक्टूबर को अफगानिस्तान से लगे खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल और राज्यपाल शासन लगाया था, और पेशावर हाईकोर्ट 20 अक्टूबर को इसके खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई करेगा।