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जनगणना नियम बदले: निजी स्कूलों के शिक्षक और "कोई भी व्यक्ति" बन सकेगा प्रगणक

यह संशोधन ऐसे समय आया है जब दो हाईकोर्ट निजी स्कूल शिक्षकों को जनगणना ड्यूटी से राहत दे चुके हैं। कांग्रेस का आरोप है कि इससे जनगणना 2027 आरएसएस और भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए रोजगार योजना बन जाएगी।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Yann (talk) / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. केंद्र ने 16 अक्टूबर को जनगणना नियम, 1990 में संशोधन कर राज्यों को निजी स्कूलों के शिक्षकों को प्रगणक नियुक्त करने की छूट दी।
  2. राज्य अब अपनी समझ से "कोई भी उपयुक्त व्यक्ति" भी इस काम पर लगा सकेंगे।
  3. जयराम रमेश ने इसे आरएसएस-भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए "रोजगार गारंटी योजना" बताया।

केंद्र सरकार ने देश की आबादी गिनने के लिए लगाए जाने वाले लोगों का दायरा बढ़ा दिया है। जनगणना नियम, 1990 में संशोधन के बाद अब राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जनगणना 2027 के लिए निजी स्कूलों के शिक्षकों, बैंकों और कंपनियों के क्लर्कों और अपनी समझ से “किसी भी उपयुक्त व्यक्ति” को प्रगणक नियुक्त कर सकेंगे।

भारत के महापंजीयक मृत्युंजय कुमार नारायण की ओर से शुक्रवार को जारी अधिसूचना में तीन तरह के लोगों को जनगणना अधिकारी बनाकर प्रगणक का काम सौंपने की बात है। पहला, “सरकार, स्थानीय प्राधिकरण, सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त निजी संस्थाओं, सोसाइटियों या ट्रस्टों के किसी भी शैक्षणिक संस्थान के शिक्षक”। दूसरा, केंद्र और राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों, सार्वजनिक उपक्रमों, वैधानिक निकायों, बैंकों, कंपनियों, संस्थानों, सोसाइटियों और ट्रस्टों के क्लर्क या अधिकारी। तीसरा, “कोई भी व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन उपयुक्त समझे”।

इसके पीछे अदालती मामले

यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब कई हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) निजी स्कूल शिक्षकों को जनगणना के काम से अलग रख चुके हैं।

इसी महीने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने हरियाणा सरकार के 1 और 7 सितंबर के उन दो पत्रों पर रोक लगाई, जिनमें जनगणना ड्यूटी के लिए शिक्षकों का ब्योरा मांगा गया था। यह रोक सिर्फ निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों पर लागू है। याचिकाकर्ता हरियाणा प्रोग्रेसिव स्कूल्स कॉन्फ्रेंस ने दलील दी थी कि न जनगणना अधिनियम, 1948 और न उसके नियम राज्य को ऐसे शिक्षकों की सेवाएं लेने का अधिकार देते हैं, और अधिनियम की धारा 4A सिर्फ स्थानीय निकायों के कर्मचारियों पर लागू होती है। मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल 2027 को है।

मई में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र को निजी गैर-सहायता प्राप्त और अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों को जनगणना में लगाने से रोक दिया था, जिससे 500 से ज्यादा स्कूलों को अंतरिम राहत मिली। अदालत ने कहा था कि इससे पढ़ाई बाधित होती है और इस तैनाती का जनगणना अधिनियम में आधार नहीं दिखता।

कांग्रेस का आरोप: “बड़ी शरारत”

कांग्रेस ने शनिवार को इस संशोधन पर हमला बोला। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, “इसके पीछे बड़ी शरारत है।”

रमेश ने अधिसूचना को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस प्रशिक्षण शिविर से जोड़ा, जो उनके मुताबिक 10 से 12 जुलाई तक कर्नाटक के बेलगावी (बेलगाम) में जनगणना 2027 पर हुआ था। साथ ही उन्होंने गृह मंत्रालय की जनसांख्यिकीय बदलाव पर उच्चस्तरीय समिति के 14 अक्टूबर को जनता से सुझाव मांगने का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “इस समिति में उच्चस्तरीय बस इतना है कि इसके सदस्य आरएसएस इकोसिस्टम से जुड़े हैं। इसलिए हमें पता है कि ये सुझाव कहां से आएंगे।”

रमेश ने कहा, “साफ है कि यह हजारों आरएसएस/भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए रोजगार गारंटी योजना है। इससे पहले से ही बिगाड़ी जा चुकी जनगणना और दूषित होगी। एक और संस्था नष्ट की जा रही है। एसआईआर की तरह जनगणना में भी खतरनाक हेरफेर होगा।” उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर “शैतानी इरादों” का आरोप लगाया।

शनिवार शाम तक सरकार ने इस आरोप का जवाब नहीं दिया था।

यह क्यों अहम है

प्रगणक वे जनगणना अधिकारी होते हैं जो हर घर का ब्योरा दर्ज करते हैं। जनगणना 2027 पहली डिजिटल जनगणना है, जिसमें लोगों को खुद अपनी जानकारी भरने का विकल्प भी मिलेगा, और इसमें जाति भी दर्ज होगी। संशोधित नियमों के तहत यह काम किससे कराया जाए, यह फैसला अब हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के हाथ में है, और किसे चुना जाए, इस पर बहुत कम पाबंदियां हैं।