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नीतिजनगणना 2027

जनगणना 2027 में जाति के दावे कैसे जांचे जाएंगे, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा

जनहित याचिका कहती है कि जनगणना फ़ॉर्म में कोई भी व्यक्ति कोई भी जाति लिख सकता है। पीठ चाहती है कि सॉलिसिटर जनरल प्रक्रिया बताएं और यह भी कि प्रमाणपत्रों की जांच होती है या नहीं।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
भारत में एक घर पर ब्योरा दर्ज करता जनगणना कर्मचारी
भारत में एक घर पर ब्योरा दर्ज करता जनगणना कर्मचारीPierce, C.C. (Charles C.), 1861-1946; James, / Wikimedia

मुख्य बातें

  1. कोर्ट ने केंद्र से जनगणना 2027 की मानक संचालन प्रक्रिया पेश करने को कहा।
  2. याचिकाकर्ता का कहना है कि जाति सिर्फ़ स्व-घोषणा के आधार पर दर्ज हो रही है, प्रमाणपत्र जांचे बिना।
  3. पीठ ने याचिका पर औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र से यह बताने को कहा कि जनगणना 2027 में जाति कैसे दर्ज की जाएगी और उसकी जांच कैसे होगी। यह निर्देश उस याचिका पर आया जिसमें कहा गया है कि गिनती पूरी तरह इस पर टिकी है कि लोग फ़ॉर्म में क्या लिखते हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से जनगणना में अपनाई जा रही मानक संचालन प्रक्रिया रिकॉर्ड पर रखने और जाति की घोषणा के तरीके पर एक नोट देने को कहा। पीठ ने याचिका पर औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया।

याचिका

आकाश गोयल की यह जनहित याचिका 14 अगस्त 2026 की जनगणना अधिसूचना के मद 10 के तहत जाति के आंकड़े जुटाने के तरीके को चुनौती देती है। इसमें सरकार से तरीका और सुरक्षा उपाय सार्वजनिक करने, जाति प्रमाणपत्र का ब्योरा दर्ज करने और जांचने की व्यवस्था बनाने, और जब तक जांचने लायक प्रक्रिया न हो तब तक जनगणना के जाति आंकड़ों को आरक्षण या कल्याण से जुड़े फ़ैसलों का एकमात्र आधार न बनाने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने कहा कि जनगणना की गलतियां एक दशक या उससे ज़्यादा समय तक कल्याण योजनाओं और बजट पर असर डाल सकती हैं। उन्होंने कहा, “आप जो देना चाहें, जो चाहें भर सकते हैं।” और जोड़ा, “उन्हें दिशानिर्देश दिखाने होंगे कि इसे दर्ज करने का आधार क्या होना चाहिए।” उन्होंने बताया कि यह जानकारी मांगने वाले आरटीआई आवेदन का जवाब नहीं मिला।

पीठ ने क्या पूछा

मुख्य न्यायाधीश ने पहले कहा, “सरकारी अधिकारी सिर्फ़ फ़ॉर्म के आधार पर जानकारी नहीं जुटाते।” इसके बाद पीठ ने सॉलिसिटर जनरल से यह स्पष्ट करने को कहा कि कोई व्यक्ति ओबीसी, एसटी या कोई और दर्जा कैसे घोषित करता है, क्या जाति प्रमाणपत्र लगाना होता है, उसे कौन जारी करता है और उसकी असलियत कैसे जांची जाती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जांच इसलिए ज़रूरी है ताकि फ़र्ज़ी प्रमाणपत्रों से असली दावेदारों का नुकसान न हो।

याचिकाकर्ता से याचिका की प्रति सॉलिसिटर जनरल को देने को कहा गया। अगली तारीख़ की घोषणा नहीं हुई।