LokVox

नीतिअदालत

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा: शिक्षकों की भर्ती पुरुष-महिला के हिसाब से अलग क्यों, ट्रांसजेंडर उम्मीदवार कहां हैं?

जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली सरकार और उसके भर्ती बोर्ड के लिए छह सवाल तय किए और 15 दिन में हलफनामे पर जवाब मांगा।

संपादकीय डेस्क से · नई दिल्लीप्रकाशित
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

मुख्य बातें

  1. अदालत ने पूछा कि डीएसएसएसबी शिक्षक पदों का विज्ञापन पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग क्यों करता है।
  2. अदालत जानना चाहती है कि ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को अधिसूचनाओं में शामिल किया जाएगा या नहीं, और कैसे।
  3. दिल्ली सरकार को 15 दिन में हलफनामा देना है; मामला 19 नवंबर को फिर सुना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने दिल्ली सरकार से पूछा है कि उसका भर्ती बोर्ड शिक्षकों की नौकरियों का विज्ञापन पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग क्यों करता है, और सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए जगह बनाने की उसकी क्या योजना है।

16 अक्टूबर के एक आदेश में, जिसकी जानकारी शुक्रवार को सामने आई, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सरकार और दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) के लिए छह सवाल तय किए। पीठ जानना चाहती है कि बोर्ड की अधिसूचनाएं किन भर्ती नियमों से चलती हैं, और क्या कोई संवैधानिक प्रावधान, कानून या सेवा नियम शिक्षक पदों को लिंग के आधार पर बांटने को कहता है। अगर ऐसा कुछ नहीं है, तो राज्य को इस वर्गीकरण का कारण बताना होगा।

पीठ ने यह भी पूछा कि क्या प्रतिवादी डीएसएसएसबी की भर्ती सूचनाओं में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को शामिल करना चाहते हैं, और अगर हां, तो कैसे। आदेश में कहा गया है, “हमारे सामने मुद्दा अधिसूचनाओं में तृतीय लिंग को शामिल न किए जाने से जुड़ा है।” सरकार के पास हलफनामे पर जवाब देने के लिए 15 दिन हैं।

दो याचिकाएं

ये सवाल दो मामलों से निकले हैं। जेन कौशिक ने डीएसएसएसबी की शिक्षक भर्ती अधिसूचनाओं में तृतीय लिंग श्रेणी न होने को चुनौती दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने उनकी याचिका पर फैसला करने के बजाय उन्हें ट्रांसजेंडर अधिकारों पर बनी एक सलाहकार समिति के पास भेज दिया। अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उस समिति के पास फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है, और अब उसने पहली नजर में हाईकोर्ट के उस फैसले पर सवाल उठाया है।

दूसरे मामले में प्रवीण सिंह ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए उम्र में छूट मांग रहे हैं। पीठ ने पूछा कि समुदाय के साथ होने वाले “सामाजिक-आर्थिक भेदभाव” को देखते हुए हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट स्थापना (नियुक्ति और सेवा शर्तें) नियम, 1972 के नियम 12 के तहत अपनी शक्ति के इस्तेमाल पर विचार क्यों नहीं किया।

मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।